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  • मध्य प्रदेश में मदरसों के रिव्यू को लेकर बीजेपी सांसद महेंद्र सिंह सोलंकी ने की सीएम से यह मांग

    मध्य प्रदेश में मदरसों के रिव्यू को लेकर बीजेपी सांसद महेंद्र सिंह सोलंकी ने की सीएम से यह मांग

    समग्र समाचार सेवा
    भोपाल, 20 अप्रैल। हिंदुत्व के मुद्दे पर मुखर रहने वाले देवास सांसद महेंद्र सिंह सोलंकी अक्सर अपने बयानों व सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर चर्चित रहते हैं। सीएम द्वारा मदरसों के रिव्यू को लेकर किए गए ट्वीट के बाद सांसद सोलंकी ने देवास शाजापुर संसदीय क्षेत्र अंतर्गत आने वाले सभी मदरसों के रिव्यू करने की मांग सीएम से की है।

    सांसद ने सीएम के फैसले को दिया धन्यवाद
    गौरतलब है कि आज अपने ट्वीट में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि जहां कट्टरता का पाठ पढ़ाने वाले संस्थान और अवैध मदरसे का रिव्यू किया जाएगा। कट्टरता और अतिवाद को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। सीएम के ट्वीट के बाद सांसद सोलंकी ने फेसबुक पोस्ट के माध्यम से कहा की “माननीय मुख्यमंत्री जी देवास शाजापुर लोकसभा क्षेत्र अंतर्गत आने वाले सभी मदरसों का रिव्यू भी बहुत जरूरी है। सांसद ने सीएम के फैसले को लेकर धन्यवाद भी दिया

  • मदरसों का विरोध क्यों?

    मदरसों का विरोध क्यों?

    -बलबीर पुंज
    गत दिनों वाम-उदारवादी और स्वघोषित सेकुलरवादी, असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा पर भड़क उठे। इसका कारण उनका वह हालिया वक्तव्य है, जिसमें उन्होंने दावा किया है कि असम में लगभग 600 मदरसे बंद किए जा चुके है और राज्य सरकार अब सभी मदरसों को बंद करना चाहती है। यूं तो भारतीय संविधान द्वारा अल्पसंख्यकों को अपने अनुरूप शिक्षण संस्था चलाने का अधिकार प्राप्त है। फिर मुख्यमंत्री सरमा ने ऐसा बयान क्यों दिया? आखिर उनके विचारों का निहितार्थ क्या है? क्या विश्व में पहली बार मदरसों के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है?

    वैश्विक समुदाय आज जिस मजहबी कट्टरता से ग्रस्त है— उसे प्रेरित करने वाली मानसिकता को पोषित करने में अधिकांश मदरसों की भी महती भूमिका है। जिस तालिबान की जकड़ में अफगानिस्तान है, जहां उसने अन्य मध्यकालीन प्रतिबंधों के साथ लड़कियों पर प्राथमिक विद्यालय से लेकर विश्वविद्यालय तक किसी भी प्रकार की शिक्षा प्राप्त करने पर रोक लगा दी है— उस तालिबान का जन्म पाकिस्तान स्थित मदरसों के भीतर ही हुआ था। वर्ष 2021 में फ्रांस ने अपने देश में मजहबी कट्टरवाद-आतंकवाद को कुचलने हेतु जिस सख्त कानून को बहुमत से पारित किया था, उसमें अन्य प्रावधानों के साथ मस्जिदों के भीतर चल रहे मदरसों को प्रतिबंधित करना भी है। वामपंथी चीन अपने इस्लाम विरोधी अभियान के अनुरूप पहले ही मदरसा शिक्षा पद्धति सहित मुसलमानों को मस्जिद जाने, कुरान पढ़ने, दाढ़ी बढ़ाने और इस्लामी नाम रखने पर पाबंदी लगा चुका है।

    मदरसा शिक्षा प्रणाली मूलत: इस्लामी मजहबी इल्म और उससे संबंधित रिवायतों पर आधारित है। यहां पढ़ने वाले अधिकांश नौनिहाल और शिक्षक मुस्लिम होते है। संक्षेप में कहे, तो इसका ‘इको-सिस्टम’ इस्लामी पहचान से ओतप्रोत रहता है। चूंकि यहां अधिकतर छात्र-शिक्षक इस्लाम को मानने वाले होते है, इसलिए अन्य मतावलंबी विद्यार्थियों-अध्यापकों के साथ उनका मेलजोल भी ना के बराबर होता है। यदि मदरसे में पढ़ रहे छात्रों का गैर-इस्लामी बच्चों से संपर्क नहीं होगा और वे सदैव अपने समुदाय के बीच रहेंगे, तो उनका दृष्टिकोण, विचार, वेशभूषा, भाषा, आकांक्षाएं, अभिलाषा और अपनी मूल सांस्कृतिक पहचान के बारे में उनकी समझ शेष समाज से भिन्न होंगी और उनके सपने भी अलग होंगे।

    एक आदर्श समाज में सभी बच्चों को न केवल शिक्षा के समान अवसर मिले, अपितु शिक्षा के माध्यम से ही उनका विकास भी समान जीवनमूल्यों से प्रेरित होना चाहिए— जिसका आधार बहुलतावाद, पंथनिरपेक्षता और लोकतांत्रिक हो। क्या अधिकांश मदरसों में ऐसी तालीम मिलना संभव है? इस पृष्ठभूमि में जनवरी 2021 में असम सरकार ने राज्य में 731 सरकारी वित्तपोषित मदरसों को नियमित विद्यालयों में परिवर्तित करने हेतु कानून पारित किया था। पुलिसिया आंकड़े के अनुसार, इस समय असम में निजी मदरसों की संख्या लगभग 3,000 है।

    वास्तव में, यह अवधारणा ही त्रुटिपूर्ण है कि मदरसों का आधुनिकीकरण करने या फिर वहां बच्चों को गणित, अंग्रेजी, विज्ञान और कंप्यूटर सिखाने से बच्चों को किसी भी प्रकार की मजहबी कट्टरवाद से दूर किया जा सकता है। सच तो यह है कि आधुनिक विषय केवल एक माध्यम है— इनका उपयोग कैसे किया जाता है, यह उपयोगकर्ता की मानसिकता पर निर्भर है। यदि वाकई आधुनिक शिक्षा प्राप्त करने से जिहादी मानसिकता का खात्मा संभव होता, तो आईआईटी बॉम्बे से रसायन अभियांत्रिकी में शिक्षा प्राप्त अहमद मुर्तजा अब्बासी, अप्रैल 2022 को उत्तरप्रदेश स्थित प्रसिद्ध गोरखनाथ मंदिर में तैनात सुरक्षाकर्मियों पर मजहबी नारे के साथ हमला क्यों करता? मई 2020 में कश्मीर स्थित गणित स्नातक हिज्बुल आतंकी रियाज नायकू सुरक्षाबलों के हाथों मुठभेड़ में क्यों मारा गया? क्या 2018 में मारा गया हिज्बुल आतंकवादी मोहम्मद रफी भट जम्म-कश्मीर विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर नहीं था? इस प्रकार के नामों (ओसामा बिन लादेन सहित) की लंबी सूची है। कटु सत्य तो यह है कि मदरसों के पाठ्यक्रम में विज्ञान, अंग्रेजी और गणित आदि विषय शामिल करने या उसमें कंप्यूटर शिक्षा जोड़ने से मध्यकालीन जिहादी मानसिकता और अधिक आधुनिक यंत्र-तंत्र के साथ न केवल सशक्त होगी, अपितु इसके अधिक विकराल होने की संभावना भी बनी रहेगी।

    क्या कारण है कि मुस्लिमों का विश्व के अधिकांश गैर-इस्लामी समाज में शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के साथ रहना लगभग असंभव है? इसका उत्तर इस्लामी अनुयायियों के एक बड़े हिस्से का ‘काफिर-कुफ्र’ अवधारणा से प्रेरित होना है। इस मानवता विरोधी चिंतन का उन्मूलन तभी संभव है, जब मुस्लिम समाज के भीतर से लोग इसके खिलाफ खड़े हो, जो यह कह सके कि मजहबी ग्रंथों में शामिल होने के बाद भी यह मान्यताएं अस्वीकार्य है, क्योंकि वह कालबाह्य हो चुकी है और इनका आधुनिक विश्व में कोई स्थान नहीं। कल्पना कीजिए एक तरफ समाज सती-प्रथा, दहेज-प्रथा और अस्पृश्यता जैसे अभिशापों से लड़ रहा हो, उसी कालखंड में शिक्षण संस्थाएं बच्चों को प्राचीन ग्रंथों को उद्धृत करके यह बताने का प्रयास करें कि यह सब मान्यताएं शास्त्रानुकूल है— क्या तब इन सामाजिक बुराइयों को मिटाना संभव है?

    व्यक्ति का बहुलतावादी चिंतन और आचरण, आदर्श समाज का आधार होता है, जिसमें परिवार और बाल्यकाल में मिले संस्कारों की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है। यदि हम अपने समाज को समरस और समावेशी बनाना चाहते है, जहां विविधता स्वीकार्य हो, सभी आस्था, परंपरा और मान्यताओं का सम्मान हो और सभी अनुयायियों को जीवन जीने की स्वतंत्रता हो— तो हमें उन शाश्वत जीवनमूल्यों को अंगीकार करना होगा, जिसकी ‘डिफॉल्ट सेटिंग’ मूल भारतीय संस्कृति है।

    बहुरूपता से भरे भारत में नागरिकों की पहचान बहुआयामी हो सकती है। परंतु कुछ मामलों में उन सभी की पहचान सांझी होनी चाहिए। आवश्यकता इस बात की है कि सभी बच्चे, चाहे वे किसी भी मजहब से क्यों न हो— वह समरूप विद्यालयों से शिक्षा प्राप्त करें, जिससे उनके भीतर ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ और ‘एकम् सत् विप्रा: बहुधा वदंति’ जैसे सांझे मूल्य अंकुरित हो सके। किसी भी मजहब या वैचारिक अधिष्ठान को यह अधिकार नहीं है कि वह लोकतांत्रिक, बहुलतावाद और सेकुलरवाद जैसे मूल्यों का अपनी मजहब या विचारधारा से प्रेरित होकर क्षरण करें। इस संदर्भ में असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के विचारों को समझने की आवश्यकता है।

    लेखक वरिष्ठ स्तंभकार, पूर्व राज्यसभा सांसद और भारतीय जनता पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय-उपाध्यक्ष हैं।
    संपर्क:- punjbalbir@gmail.com

  • अवैध मदरसों के खिलाफ काल बने सीएम योगी, 2 महीने में बंद करवाए 100 अवैध मदरसे

    अवैध मदरसों के खिलाफ काल बने सीएम योगी, 2 महीने में बंद करवाए 100 अवैध मदरसे

    समग्र समाचार सेवा
    नई दिल्ली, 18जनवरी। कट्टरवाद के खिलाफ जंग में यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ की कार्रवाई की मिसाल दी जाती है. लेकिन अब उन्ही की पार्टी से जुड़े दूसरे सीएम उनसे आगे निकल गए हैं. उन्होंने अपने राज्य में सख्ती बरतते हुए न केवल मदरसों का सर्वे करवाया बल्कि 2 महीने के अंदर उनमें से 100 को स्थाई रूप से बंद भी कर दिया. यही नहीं आतंकियों से संबंध मिलने पर 4 मदरसों को जेसीबी के जरिए मिट्टी में भी मिला दिया गया.

    योगी से आगे निकले हिमंता बिस्वा सरमा
    यह राज्य और कोई नहीं बल्कि असम है और इस साहसिक कार्रवाई को अंजाम दिया है वहां के सीएम हिमंता बिस्वा सरमा ने. असम में पिछले दो महीने में करीब 100 मदरसा बंद हो गए हैं. असम पुलिस का कहना है कि ये मदरसे सरकारी गाइडलाइन पर खरे नहीं रहे थे. राज्य के डीजीपी भाष्कर ज्योति महंतो ने कहा कि जिन मदरसों को बंद करवाया गया है वे सब छोटे मदरसे थे, जो पास के बड़े मदरसे के साथ जुड़ गए. आतंकी इन छोटे मदरसों को टारगेट बनाकर टेरर मॉड्यूल बना रहे थे.

    आदेश न मानने पर 100 मदरसे हुए बंद
    सरकार ने पिछले साल राज्य में मदरसे चलाने वाले 4 मदरसा बोर्ड को नोटिस जारी किया था. उस नोटिस में राज्य में संचालित सभी मदरसों को 30 नवंबर तक सरकारी पोर्टल में रजिस्टर करवाने का निर्देश दिया गया था. साथ ही मदरसे की जमीन, उनमें पढ़ाने वाले मौलवियों की डिटेल भी मांगी गई थी. जो 100 मदरसे बंद हुए हैं, उन्होंने सरकार का यह निर्देश मानना उचित नहीं समझा. जिसके बाद उनके खिलाफ कार्रवाई की गई.

  • उत्तराखंड के मदरसों में ‘मॉर्डन शिक्षा’मौलानाओं को नही आई पसंद, कहा- प्राइवेट मदरसों में कुछ न करने देंगे

    उत्तराखंड के मदरसों में ‘मॉर्डन शिक्षा’मौलानाओं को नही आई पसंद, कहा- प्राइवेट मदरसों में कुछ न करने देंगे

    समग्र समाचार सेवा
    नई दिल्ली, 26नवंबर। उत्तराखंड सरकार ने वक्फ बोर्ड के अंतर्गत आने वाले राज्य के सभी मदरसों में ड्रेस कोड और एनसीईआरटी की किताबें लागू करने की घोषणा की है। जिसके बाद से ही मुस्लिम समाज नाराज दिखाई दे रही है।
    इस बात से नाराज मौलाना साजिद रशीदी ने देश जलाने तक की बात कह दी।
    जी हां एक मीडिया सर्वे के दौरान मौलाना ने कहा कि सरकार ने प्राइवेट मदरसों को छूने की हिम्मत की तो देश जलने लगेगा।

    मौलाना साजिद रशीदी ने यह भी कहा है, “हर राज्य में एक मदरसा बोर्ड है जो सरकार के अधीन काम करता है। उन मदरसों में, सरकार ड्रेस कोड का आदेश दे सकती है। यही नहीं, फिल्में और गाने भी चला सकती है। इन मदरसों में सरकार जो चाहे वो कर सकती है और उसे कोई नहीं रोक रहा। लेकिन, सरकार यह सुन ले कि हम उन्हें प्राइवेट मदरसों में कुछ नहीं करने देंगे, क्योंकि भारतीय मुसलमान 4% बच्चों को प्राइवेट मदरसों से मौलवी और मौलाना बनने के लिए रखते हैं। अगर सरकार उन 4% मदरसों में हस्तक्षेप करने की कोशिश करती है, तो सभी भारतीय मुसलमान इसके खिलाफ खड़े होंगे और ऐसा नहीं होने देंगे।”

    साजिद रशीदी ने आगे कहा है, “हम सरकार से कुछ नहीं लेते। ये वो मूर्ख लोग हैं जिन्होंने सरकार की आय के लिए अपने मदरसे सरकार को दे दिए और अब इसका खामियाजा भुगत रहे हैं। इसलिए, हमारे बड़े मौलवी और उलेमा दूसरों को मदरसों के लिए सरकार से कोई पैसा नहीं लेने के लिए कहते हैं।”

    दरअसल, गुरुवार (24 नवंबर 2022) को उत्तराखंड वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष शादाब शम्स ने कहा था कि वक्फ बोर्ड के दायरे में आने वाले सभी 103 मदरसों को मॉडर्न बनाया जाएगा। मदरसों में ड्रेस कोड और एनसीईआरटी पाठ्यक्रम लागू किया जाएगा। वक्फ बोर्ड अध्यक्ष ने कहा था कि पहले चरण में 7 मदरसों को मॉडर्न बनाया जा रहा है। इसमें देहरादून, उधमसिंह नगर और हरिद्वार के दो-दो मदरसों एवं नैनीताल जिले के एक मदरसे को मॉडर्न स्कूल बनाने के लिए चुना गया है। इसके बाद इस व्यवस्था को अन्य मदरसों पर भी लागू कर दिया जाएगा।

  • यूपी के 8441 गैर मान्यता प्राप्त मदरसों के खिलाफ होगी कार्रवाई, सर्वे के बाद अधिकारियों ने सरकार को सौंपी रिपोर्ट

    यूपी के 8441 गैर मान्यता प्राप्त मदरसों के खिलाफ होगी कार्रवाई, सर्वे के बाद अधिकारियों ने सरकार को सौंपी रिपोर्ट

    समग्र समाचार सेवा
    लखनऊ, 17नवंबर। उत्तर प्रदेश सरकार ने अधिकारियों को गैर मान्यता प्राप्त मदरसों के खिलाफ कार्रवाई करने का निर्देश दिया है. जिलाधिकारियों द्वारा राज्य सरकार को सौंपी गई एक रिपोर्ट के अनुसार राज्य भर में लगभग 8,441 मदरसों की मान्यता नहीं है. अल्पसंख्यक कल्याण, मुस्लिम वक्फ और हज राज्य मंत्री धर्मपाल सिंह ने कहा कि उन्होंने विभाग के अधिकारियों को विभाग के पोर्टल और एमईएलए ऐप पर सभी गैर-मान्यता प्राप्त मदरसों की सूची अपलोड करने का निर्देश दिया है, ताकि माता-पिता को किसी विशेष मदरसे के बारे में सही जानकारी मिल सके और वे ऐसा कर सकें. अपने बच्चों को गलत संस्थानों में ना भेजें जहां उन्हें गुमराह किया जा सके.

    मंत्री ने कहा कि सर्वेक्षण के दौरान, 8,441 गैर-मान्यता प्राप्त मदरसों की पहचान की गई, जिसमें लगभग 7,64,164 छात्र, लड़कियां और लड़के नामांकित थे. उन्होंने कहा, ये बच्चे हमारे देश का भविष्य हैं और यह सुनिश्चित करने के लिए कि वे मुख्यधारा के समाज से जुड़े, यह आवश्यक है कि उन्हें आधुनिक शिक्षा तक पहुंच प्रदान की जाए. सिंह ने अधिकारियों को अल्पसंख्यक समुदाय के बच्चों को नए शिक्षा कानूनों के अनुसार शिक्षा प्रदान करने के लिए कार्रवाई करने का निर्देश दिया.

    उन्होंने कहा कि गैर-मान्यता प्राप्त मदरसों के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई की जानी चाहिए और अब तक पहचाने गए सभी गैर-मान्यता प्राप्त मदरसों के बारे में एक स्पष्ट तस्वीर देने के लिए एक प्रस्तुति तैयार की जानी चाहिए. गौरतलब है कि राज्य सरकार के आदेश पर 10 सितंबर को सभी जिलों में मदरसों का सर्वे शुरू किया गया था. सर्वाधिक संख्या में गैर मान्यता प्राप्त मदरसे मुरादाबाद जिले में पाए गए. (एजेंसी इनपुट्स)

  • 15 नवंबर के बाद गैर मान्यता प्राप्त मदरसों पर गिरेगी गाज, यूपी सरकार को अंतिम रिपोर्ट का इंतजार

    15 नवंबर के बाद गैर मान्यता प्राप्त मदरसों पर गिरेगी गाज, यूपी सरकार को अंतिम रिपोर्ट का इंतजार

    समग्र समाचार सेवा
    लखनऊ,8नवंबर। उत्तर प्रदेश की योगी सरकार 15 नवंबर के बाद उन मदरसों के खिलाफ कोई एक्शन ले सकती है जो सर्वे में गैर मान्यता प्राप्त पाए गए हैं। सूत्रों की माने तो अब तक यूपी में लगभग 8 हजार मदरसे मिले हैं जो गैर मान्यता प्राप्त हैं। हालांकि इसमें यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि इन मदरसों में दारुल उलूम देवबंद के मदरसे भी शामिल हैं या नहीं। सरकार के निर्णय को लेकर दारुल उलूम पहले ही कह चुका है कि वह अपने मदरसों में धार्मिक प्रशिक्षण देना जारी रखेंगे। इस बीच यूपी के अल्पसंख्यक मंत्री धर्मपाल सिंह ने कहा है कि रिपोर्ट का इंतजार है। एक रिपोर्ट आने के बाद उसे सीएम योगी आदित्यनाथ को सौँपा जाएगा। अंतिम फैसला वही लेंगे।

    दरसअल अभी यूपी के सभी जिलाधिकारियों की ओर से राज्य सरकार को रिपोर्ट नहीं भेजी गई है। अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री धर्मपाल सिंह ने कहा कि रिपोर्ट का विस्तार से अध्ययन किया जाएगा। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के परामर्श से अंतिम निर्णय लिया जाएगा। हमारा संकल्प यह सुनिश्चित करना है कि सभी जातियों और समुदायों के सभी बच्चों को ऐसी शिक्षा मिले जो उन्हें समय के साथ तालमेल बिठाने में मदद करे।’

    दारुल उलूम देवबंद ने पहले ही साफ कर दिया है कि उसकी राज्य के मदरसा बोर्ड से संबद्धता लेने की कोई योजना नहीं है और वह इसके साथ दाखिला लेने वाले छात्रों को बड़े पैमाने पर धार्मिक शिक्षण प्रदान करना जारी रखेगा। जबकि दारुल उलूम 1866 में स्थापित किया गया था, लखनऊ स्थित इस्लामिक मदरसा, नदवतुल उलमा, की स्थापना 1898 में हुई थी। ये सोसाइटी एक्ट के तहत पंजीकृत हैं और दक्षिण एशिया में अरबी में शिक्षण प्रदान करने वाले कुछ इस्लामिक मदरसों में से एक माना जाता है।

    अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री धर्मपाल ने कहा कि एक धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक व्यवस्था में, सभी अपनी पसंद के धर्म को आगे बढ़ाने के लिए स्वतंत्र हैं। लेकिन केवल धार्मिक शिक्षा से यहां पढ़ने वाले छात्र डॉक्टर, इंजीनियर, नौकरशाह और प्रबंधक के रूप में सफल नहीं हो सकते। उन्हें हिंदी, अंग्रेजी, गणित और अन्य प्रासंगिक विषय भी सीखने चाहिए।’ दारुल उलूम ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वे शिक्षण पद्धति में किसी भी बदलाव की अनुमति नहीं देंगे और धर्मशास्त्र आधारित शिक्षण को जारी रखेंगे, इस मुद्दे पर सरकार की प्रतिक्रिया अभी भी स्पष्ट नहीं है।

  • यूपी में मदरसों का सर्वे समाप्त, 75 हजार मदरसे निकले फर्जी- अब होगी कार्यवाही

    यूपी में मदरसों का सर्वे समाप्त, 75 हजार मदरसे निकले फर्जी- अब होगी कार्यवाही

    समग्र समाचार सेवा
    लखनऊ, 21अक्टूबर। उत्तर प्रदेश में मदरसों के सर्वे का काम अब पूरा हो चुका है. सर्वे के मुताबिक राज्य में करीब 7500 गैर मान्यता प्राप्त मदरसे अलग अलग जिलों में संचालित किए जा रहे हैं. सभी जिलों के जिलाधिकारी इस अपने अपने जिले के सर्वे रिपोर्ट को 15 नवंबर 2022 तक सौंपेंगे. बता दें कि उत्तर प्रदेश में 16 हजार से अधिक मदरसे हैं. इन मदरसों के सर्वे के काम अलग अलग जिलों में अल्पसंख्या कल्याण अधिकारी और एसडीएम के नेतृत्व में हो रहा है.

    बता दें कि बीते दिनों राज्य के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने मदरसों की शिक्षा की गुणवता को बेहतरा बनाने को लेकर बयान जारी किया था. इस दौरान उन्होंने कहा कि राज्य में गलत तरीके से मदरसे संचालित किए जा रहे हैं जिनके खिलाफ सख्त कार्यवाही की जाएगी. ब्रजेश पाठक ने कहा कि कई शिकायतें मिली जहां कई मदरसों में देशविरोधी काम चल रहे थे. राज्य में जो मदरसे अच्छा काम करेंगे उन्हें राज्य सरकार द्वारा प्रोत्साहित किया जाएगा.

    यूपी मदरसा बोर्ड के अध्यक्ष आईए जावेद ने बताया कि राज्य में 7500 से अधिक गैर मान्यता प्राप्त मदरसों की पहचान की गई है. इस बाबत सर्वे रिपोर्ट 15 नवंबर तक मिल जाएगी. बच्चों को अच्छी और बेहतर शिक्षा देने के इरादे से इस सर्वे को आयोजित किया गया.

    सर्वे के दौरान मदरसों की जानकारी जुटाई गई जिसमें मदरसों में पेयजल, बिजली की सुविधा, मकान की स्थित इत्यादि चीजों का सर्वे की टीम ने जायजा लिया. वहीं मदरसों में पढ़ रहे छात्र-छात्राओं की संख्या की जानकारी जुटाई गई. बता दें कि इस सर्वे में मदरसे का नाम, उसे संचालित करने वाले व्यक्ति का नाम और कब से पढ़ाई हो रही है इन सब चीजों की जानकारी इकट्ठी की गई है.

  • सीएम धामी ने किया ऐलान, उत्तराखंड में भी मदरसों का होगा सर्वे

    सीएम धामी ने किया ऐलान, उत्तराखंड में भी मदरसों का होगा सर्वे

    समग्र समाचार सेवा
    देहरादून, 13सितंबर। उत्तर प्रदेश में इन दिनों मदरसों का सर्वे किया जा रहा है, इसी तर्ज पर अब उत्तराखंड में मदरसों का सर्वे किया जाएगा. इस बात का ऐलान खुद सीएम पुष्कर सिंह धामी ने किया है. एक कार्यक्रम में मीडिया के सवालों का जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि मदरसों को लेकर तमाम तरह की बातें की जाती हैं, इसलिए इनकी वस्तुनिष्ठ स्थिति को समझने के लिए एक बार सर्वे कराए जाने की जरूरत है. सीएम धामी का यह ऐलान ऐसे वक्त में आ रहा है जब उत्तर प्रदेश में मदरसों को लेकर राजनीतिक गर्म है.

    उत्तर प्रदेश सरकार ने 31 अगस्त को सूबे में संचालित सभी गैर मान्यता प्राप्त निजी मदरसों का सर्वे करने का आदेश दिया था. इसके लिए 10 सितंबर तक टीम गठित करने का काम खत्म कर लिया गया था. आदेश के मुताबिक 15 अक्टूबर तक सर्वे पूरा करके 25 अक्टूबर तक रिपोर्ट सरकार को सौंपने को कहा गया है. उत्तर प्रदेश प्रदेश में इस वक्त लगभग 16 हजार निजी मदरसे हैं जिनमें प्रसिद्ध इस्लामी शिक्षण संस्थान नदवतुल उलमा और दारुल उलूम देवबंद भी शामिल हैं. इस फैसले के खिलाफ निजी मदरसों के संचालकों ने तरह-तरह की आशंकाएं जाहिर की थी. जिससे लेकर छह सितंबर को दिल्ली में जमीयत-उलमा-ए-हिंद की एक बैठक भी हुई थी, जिसमें कहा गया कि अगर सरकार सर्वे करना चाहती है तो करे लेकिन मदरसों के अंदरूनी मामलों में कोई दखलंदाजी नहीं होनी चाहिए.

  • मदरसों में बच्चों को ईशनिंदा करने वालों का सर कलम करना सिखाया जाता है: राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान

    मदरसों में बच्चों को ईशनिंदा करने वालों का सर कलम करना सिखाया जाता है: राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान

    समग्र समाचार सेवा
    तिरुवनंतपुरम, 2 जुलाई। नूपुर शर्मा विवाद में कन्हैया लाल की हत्या से पूरा देश सदमे में है। हर कोई भारत में तालिबानी सोच के बढ़ते प्रसार से चिंतित है। लोग सोचने लगे हैं कि मुस्लिम समाज के एक तबके में बढ़ते कट्टरपंथी विचारों की आलोचना की जाए या नहीं, सवाल उठाया जाए या नहीं। समाज के एक वर्ग में बढ़ती कट्टरता के कारणों पर भी तमाम तरह की बातें हो रही हैं। इस बीच केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने कहा है कि मदरसे नफरत की जड़ हैं। उन्होंने कहा कि बचपन में ही सिखाया जा रहा है कि कोई विरोध में बोले तो सर कलम कर दो।

    आरिफ मोहम्मद ने कहा, ‘सवाल यह है कि क्या हमारे बच्चों को ईशनिंदा करने वालों का सर कलम करना पढ़ाया जा रहा है। मुस्लिम कानून कुरान से नहीं आया है, वह किसी इंसान ने लिखा है जिसमें सर कलम करने का कानून है और यह कानून बच्चों को मदरसा में पढ़ाया जा रहा है।’ उन्होंने ये बातें राजस्थान के उदयपुर में कन्हैया लाल की बर्बरता से की गई हत्या को लेकर अपनी टिप्पणी में कहीं। उन्होंने कहा कि हम लक्षण दिखने पर चिंतित होते हैं लेकिन गंभीर बीमारी को मानने से इनकार कर देते हैं।

    आरिफ मोहम्मद खान अक्सर कहते रहते हैं कि मौलाना और मदरसों ने मुसलमानों के एक तबके को कट्टर बना रहा है। वो गैर-मुस्लिमों के प्रति नफरत करना सिखाते हैं जिस कारण बचपन में ही दूसरे धर्मों के प्रति नफरत का भाव पनप जाता है। ऐसे में जब वो बड़े होते हैं तो हमेशा दूसरे धर्म के लोगों के प्रति सतर्क रहते हैं और संदेह से भरे होते हैं। आरिफ के इन विचारों की कड़ी आलोचना भी होती रहती है।

  • उत्‍तर प्रदेश के मदरसों में अब राष्‍ट्रगान हुआ अनिवार्य

    उत्‍तर प्रदेश के मदरसों में अब राष्‍ट्रगान हुआ अनिवार्य

    समग्र समाचार सेवा

    लखनऊ, 25 मार्च। उत्‍तर प्रदेश के मदरसों में अब राष्‍ट्रगान  अनिवार्य कर दिया गया है। इस सत्र से सभी अनुदानित और गैर अनुदानित मदरसों में कक्षाएं शुरू करने से पहले अन्‍य दुआओं के साथ विद्यार्थियों को राष्‍ट्रगान गाना पड़ेगा। उत्‍तर प्रदेश मदरसा शिक्षा परिषद ने गुरुवार को हुई बैठक में यह फैसला लिया है।

    परीक्षाएं 14 से 27 मई के बीच कराने का निर्णय

    मदरसा बोर्ड के अध्‍यक्ष इफ्तिखार अहमद जावेद की अध्‍यक्षता में हुई बैठक में और भी कई फैसले लिए गए। मुंशी, मौलवी, आलिम, कामिल और फाजिल की परीक्षाएं 14 से 27 मई के बीच कराने का निर्णय हुआ है। माध्‍यमिक शिक्षा परिषद के स्‍कूलों में गर्मी की छुट्टी और यूपी बोर्ड परीक्षा की कॉपियों के मूल्‍यांकन के वजह से कॉलेज खाली नहीं रहेंगे। इ‍सलिए मदरसा बोर्ड की परीक्षाएं मदरसों में ही कराई जाएंगी।

    नए सत्र से ऑनलाइन रजिस्‍ट्रेशन की सुविधा

    इसके अलावा मदरसा बोर्ड में अब से छह प्रश्‍नपत्रों की परीक्षा होगी। इसमें क्‍लॉस 1 से 8 तक के सिलेबस में दीनियात के अलावा हिंदी, अंग्रेजी, गणित, विज्ञान और सामाजिक विज्ञान के प्रश्‍नपत्र होंगे। इसके अलावा हर मदरसे में शिक्षकों की उपस्थिति के लिए बायोमेट्रिक सिस्‍टम लगाया जाएगा। नए सत्र से छात्रों के ऑनलाइन रजिस्‍ट्रेशन की सुविधा भी शुरू की जाएगी।