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  • भारतीयता के बोध के लिए हिंदी सबसे अच्छी भाषा है इसलिए इसे वैश्विक स्वीकार्यता के स्तर पर ले जाना है: डॉ. महेन्द्र नाथ पांडेय

    भारतीयता के बोध के लिए हिंदी सबसे अच्छी भाषा है इसलिए इसे वैश्विक स्वीकार्यता के स्तर पर ले जाना है: डॉ. महेन्द्र नाथ पांडेय

    समग्र समाचार सेवा
    नई दिल्ली, 20 जुलाई। भारी उद्योग मंत्रालय में आज हिंदी पखवाड़ा पुरस्कार वितरण समारोह का भव्य आयोजन किया गया। समारोह में भारी उद्योग मंत्री डॉ. महेन्द्र नाथ पांडेय ने पिछले वर्ष आयोजित पखवाड़े की 9 प्रतियोगिताओं के 25 विजेताओं को प्रशस्ति-पत्र प्रदान किए। इनमें अनुच्छेद लेखन, अनुवाद, वाचन, टिप्पण-प्रारुपण, आशुभाषण और श्रुतलेखन प्रतियोगिताएं शामिल हैं। इनके अतिरिक्त, सितंबर-2022 माह के दौरान हिंदी में अधिकाधिक सरकारी कामकाज के लिए भी चार कर्मियों को पुरस्कृत किया गया। संयुक्त सचिव विजय मित्तल जी ने कहा कि पहली बार, मंत्रालय में चार अनुभागों को भी पुरस्कृत किया गया है।

    कार्यक्रम में, राज्य सभा के संसद सदस्य, सीमा द्विवेदी और सुजीत कुमार भी उपस्थित थे। इनके अलावा, मंत्रालय की हिंदी सलाहकार समिति के दो सदस्य डॉ. वंदना पांडेय और डा. पूरनचंद टंडन भी कार्यक्रम में मौजूद थे।

    इस अवसर पर सांसद सुजीत कुमार ने कहा कि हर देश अपनी भाषा में ही प्रगति करता है। चीन,जापान और जर्मनी आदि में तकनीकी पढ़ाई भी उनकी मातृभाषा में ही होती है, इसलिए हम वैसी ही सफलता हिंदी का उपयोग करके भी हासिल कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि स्वयं उड़िया भाषी होने के बावजूद उन्हें हिंदी पसंद है। सांसद सुश्री सीमा द्विवेदी ने विश्वास व्यक्त किया कि मंत्रीजी के हाथों से पुरस्कार पाने से प्रतिभागी आगे भी इन प्रतियोगिताओं में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने के लिए प्रेरित होंगे। उन्होंने यह भी कहा कि हिंदी में बात करने का मतलब कम शिक्षित होना माना जाता था,लेकिन भारी उद्योग मंत्रालय में समस्त कामकाज हिंदी में करवाने का बीड़ा उठाकर भारी उद्योग मंत्रीजी ने इस धारणा को तोड़ा है। भारी उद्योग मंत्री डॉ. महेन्द्र नाथ पांडेय ने कहा कि प्रधानमंत्रीजी ने भी इस बात पर ज़ोर दिया है कि लोक कल्याणकारी योजनाओं की जानकारी जनता को जन-सामान्य की भाषा में दिया जाए। उन्होंने जोर देकर कहा कि केंद्र सरकार क्षेत्रीय भाषाओं के खिलाफ नहीं,बल्कि उसके पक्ष में है। डॉ. पाण्डेय ने कहा कि भारतीयता के बोध के लिए हिंदी सबसे अच्छी भाषा है और इसलिए इसे वैश्विक स्वीकार्यता के स्तर पर ले जाना है।

  • प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने भारत और भारतीयता के गौरव को विश्वभर में बुलंद करने का काम किया है:अमित शाह

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने भारत और भारतीयता के गौरव को विश्वभर में बुलंद करने का काम किया है:अमित शाह

    समग्र समाचार सेवा
    देहरादून, 30मार्च। केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह आज उत्तराखंड के हरिद्वार में गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के 113वें दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि के रुप में शामिल हुए। इस अवसर पर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी, गुरुकुल कांगड़ी के कुलाधिपतिडॉ. सत्यपाल सिंह सहित अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे।

    अमित शाह ने सभी देशवासियों को रामनवमी की शुभकामनाएं दींऔरकहा कि भगवान श्री राम के जन्मदिन के दिन ही आज शिक्षार्थी यहाँ से एक नए जीवन की शुरुआत करने जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि विद्यार्थियों से कहा कि उन्हे जीवनभर गर्व रहेगा कि उनकी शिक्षा,दीक्षा और दीक्षांत तीनों गुरुकुल कांगड़ी जैसे महान संस्थान में हुए।श्री शाह ने कहा कि महर्षि श्रद्धानंद जी ने जिस गुरुकुल कांगड़ी की नींव डाली आज वो एक महान वटवृक्षबनकर समग्र देश और दुनिया को महर्षि दयानंद का संदेश दे रहा है और हमारी पौराणिक शिक्षा पद्धति को जीवित रखते हुए राष्ट्र में गौरव के साथ विद्यमान है।

    केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री ने कहा कि गुरुकुल कांगड़ी की शिक्षा पद्धति का महत्व देखकर ही राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, हमारे राष्ट्रपति रहे डॉ. राजेंद्र प्रसाद और डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन, डॉ. श्यामा प्रसाद मुख़र्जी, मोरारजी भाई देसाई जैसे अनेक महानुभावों ने इस पुण्य भूमि पर अपने पैर रखे और इस शिक्षा व्यवस्था को बल देने का काम किया। उन्होंने कहा कि आज का दिन यहां से दीक्षित होकर जाने वाले बैच के लिए गर्व का विषय है क्योंकि यहबैच आजादी के अमृत महोत्सव और महर्षि स्वामी दयानंद के 200 वें जन्म वर्ष का बैच है। आजादी के अमृत महोत्सव के इस बैच मेंकुल 1800 विद्यार्थी शिक्षा की दीक्षा प्राप्त कर नए जीवन की शुरुआत करेंगे जिसमें 400 छात्राएं और 105 पीएचडी के छात्र शामिल हैं। श्री शाह ने गोल्ड मेडल प्राप्त करने वाले छात्र-छात्राओं को भी बधाई दी।

    अमित शाह ने कहा कि इस पावन भूमि पर स्वामी श्रद्धानंद जी ने वैदिक शिक्षा की जोत जलाकर उसकी परंपरा को आगे बढ़ाने की शुरुआत की। स्वामी श्रद्धानंद जी ने महर्षि दयानंद जी का संदेश हूबहू जमीन पर उतारने का काम किया जिन्होंने पराधीन भारत को स्वाधीन बनाने के लिए बहुत बड़ी भूमिका अदा की, शिक्षा के बोध को जागरूक और संरक्षित किया तथामातृभाषा में शिक्षा का अलख जगाने के साथ-साथ हिंदी को भी इस देश में महत्वपूर्ण स्थान देने में बहुत बड़ा योगदान निभाया। उन्होंने कहा कि स्वामी श्रद्धानंद जी ने शिक्षा को विदेशी प्रभाव से बाहर निकालने के सार्थक प्रयास किएऔर हमारी परंपरागत शिक्षा पद्धति को नई ऊर्जा देने के लिए वैदिक मूल्यों, प्राचीन भारतीय संस्कृति, वेदों-उपनिषदों के ज्ञान और समग्र ब्रह्मांड के विज्ञान के साथ आधुनिक विषयों को जोड़कर शिक्षा को परिपूर्ण बनाने का काम किया।

    केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री ने कहा कि तैत्तिरीय उपनिषद में पंचकोश के माध्यम से व्याख्‍यायित की गयी विद्या पद्धति को पुनर्जीवित करने में स्वामी श्रद्धानंद जी का बहुत बड़ा योगदान है। उन्होंने कहा कि इसमें कोई संशय नहीं है कि कांगड़ी गुरुकुल का 121 साल का इतिहास वैदिक शिक्षा के पुनर्जागरण की नींव के रूप में इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों से लिखा जाएगा। केन्द्रीय मंत्री शाह ने कहा कि आज गुरुकुल कांगडी विश्वविद्यालय की शैक्षणिक गुणवत्ता बढ़ गयी है। विश्वविद्यालय के गत शैक्षणिक सत्रों में 870 से ज्यादा शोध पत्र व 9 पैटेंट रजिस्टर किए गये हैं। उन्होंने कहा कि वैदिक शिक्षा और आधुनिक शिक्षा का शुभ संगम आज गुरुकुल कांगड़ी ने किया है इसके लिए उन्होने कुलाधिपति, कुलपति और सभी गुरुजनों को हृदयपूर्वक बहुत-बहुत बधाई दी। गृह मंत्री ने दीक्षित होकर जाने वाले सभी विद्यार्थियों से अनुरोध किया कि वे महर्षि दयानंद के संदेश को हमेशा अपने मन से लगाकर रखें और अपनी आदतों मेंस्वामी दयानंद के बताए हुए रास्तों को अपनाकर उस पर चलने का प्रयास करें क्योंकि आत्मा के कल्याण का वही एकमात्र मार्ग है जिस पर चलकर हम देश को आगे ले जा सकते हैं।

    अमित शाह ने कहा कि देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी नई शिक्षा नीति लेकर आए हैं, इसमें महर्षि दयानंद जी की एक्सेसिबल शिक्षा की दृष्टि और श्रद्धानंद जी के वेद व विज्ञान की शिक्षा के समन्वय का संदेश है तो वहीं राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के मातृभाषा में शिक्षा का संदेश और स्वतंत्रता सेनानी लाला लाजपत राय के एजुकेशन फॉर ऑल का संदेश भी चरितार्थ होता है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी जी ने नई शिक्षा नीति के अंदर मातृभाषा के महत्व को प्रस्तावित किया है। उन्होंने मातृभाषा में प्राथमिक शिक्षा देने व त्रिभाषा का सूत्र दिया है ताकि आने वाले दिनों में मातृभाषा से पढ़े हुए मेधावी छात्र समग्र देश और विश्व का कल्याण करें। केन्द्रीय मंत्री शाह ने कहा कि देश में10 राज्यों के 20 इंजीनियरिंग कॉलेजों में हिंदी, तमिल, कन्‍नड़, तेलुगू, मराठी और बांग्ला में इंजीनियरिंग की पढ़ाई शुरू हो चुकी है,मध्य प्रदेश में मेडिकल साइंस शिक्षा की हिंदी भाषा मेंशुरुआत हो चुकी है। उन्होने कहा कि देश में मोदी सरकार ने ऐसी व्यवस्था शुरू की है कि अब जेईई, नीट जैसी कई परीक्षाओं को मातृभाषा में दिया जा सकेगा और विद्यार्थी इसके माध्यम से उत्तीर्ण होकर देश के विकास में योगदान दे सकेंगे।

    केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री ने कहा किनई शिक्षा नीति को स्ट्रीमलैस और क्‍लासलैस बनाया गया है। अब साइंस के विद्यार्थियों को भी देश का इतिहास पढ़ने और आर्ट के विद्यार्थियों कोविज्ञान पढ़ने का मौका मिलेगा, जिससेकिसी भी बच्चे को अपने आंतरिक क्षमता को बाहर निकालने का मौका मिलेगा। उन्होंने कहा कि मल्टीपल एंट्री, मल्टीपल एग्जिट नई शिक्षा नीति का एक विशेष अंग है जिसके तहत एक साल की पढ़ाई करने पर सर्टिफिकेट, दो साल की पढ़ाई करने पर डिप्लोमा, तीन साल की पढ़ाई करने पर डिग्री और चार साल की पढ़ाई करने पर रिसर्च का प्रावधान है। हर स्तर पर बच्चा एग्जिट व एंट्री कर सकता है। केन्द्रीय मंत्री शाह ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी द्वारा यह व्यवस्था इसलिए की गयी है ताकि हमारे युवाओं को एक ऐसा प्लेटफार्म मिले जिस पर खड़े होकर वे समग्र विश्व के युवाओं के साथ स्पर्धा कर सकें और पूरे में विश्व मां भारती का यशोगान हो।

    अमित शाह ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने स्टार्टअप इंडिया के माध्यम से युवाओं के लिए ढेर सारे मौके सृजित किए हैं। देश में साल 2016 में स्टार्टअप की संख्या 724 थी जो 2022 में बढ़कर 70 हजार से भी ज्यादा हो गयी। इनमें से 10,000 से ज्यादा स्टार्टअप कोरोनाकाल में बने। वर्ष 2016 से पहले सिर्फ 4 यूनिकोर्न स्टार्टअप थे और आज देश में 107 स्टार्टअप यूनिकॉर्न क्लब में शामिल हो चुके हैं। उन्होंने कहा कि कुल स्टार्टअप में से 44% स्टार्टअप महिलाओं द्वारा चलाए जाते हैं जो कि इस बात का परिचायक है कि महिलाएं भी इस देश में बहुत बड़ा योगदान कर सकती हैं । वहीं 50% स्टार्टअप टीयर-II और टीयर-IIIशहरों से आए हैं। यह हमारे लिए एक प्रेरणादायक क्योंकि हम सब छोटे-छोटे गांवों व शहरों से आते हैं। केन्द्रीय मंत्री शाह ने कहा कि देश में पहले पेटेंट रजिस्टर करने वालों की संख्या बहुत कम थी। साल 2013-14 में 3000 पेटेंट के आवेदन किए जाते थे जिनकी संख्या 2021-22 में बढ़कर डेढ़ लाख हो गयी है।

    केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री ने कहा कि सरकार द्वारा आईआईटी, आईआईएम, एम्स, मेडिकल कॉलेज, विश्वविद्यालय और अन्य कॉलेजों की संख्या में बहुत बड़ी बढ़ोतरी की गयी है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने भारत और भारतीयता दोनों के गौरव को विश्वभर में बुलंद करने का काम किया है। देश की सुरक्षा से जुड़े ढेर सारे ऐसे मुद्दे थे जो लगते थे कि कभी भी हल नहीं होसकते, उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने चुटकी बजाकर हल किया है। प्रधानमंत्री मोदी जी ने हर क्षेत्र में देश के गौरव को बढ़ाने का काम किया है, चाहे वह धारा 370 हटाना हो, देश को सुरक्षित करना हो, देश को 11वें नंबर की इकोनॉमी से पांचवें नंबर की इकोनॉमी बनाना हो या देश की सीमाओं को सुरक्षित करना हो या आए दिन आतंकवादी हमले करने वाले पड़ोसी देश को सर्जिकल स्ट्राइक और एयर स्ट्राइक करके सबक सिखाना हो। केन्द्रीय मंत्री शाह ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी द्वारा आजादी के अमृत महोत्सव वर्ष में देश के सामने एक लक्ष्य रखा है कि अगले 25 साल बादजब देश की आजादी की शताब्दी मनाई जाए तब 130 करोड़ भारतीय पुरुषार्थ कर एक ऐसे भारत का निर्माण करें जो समग्र विश्व में हर क्षेत्र में सर्वप्रथम हो और युवाओं की इसमें विशेष जिम्मेदारी है। केन्द्रीय मंत्री शाह ने दीक्षित होकर जा रहे युवाओं से अनुरोध किया कि वे महर्षि दयानंद और स्वामी श्रद्धानंद जी की कल्पना का भारत बनाने के लिए जीवन पर्यंत यत्‍न करते रहें और अपने पुरुषार्थ से भारत को विश्व में सबसे आगे पहुंचाने के लिए हरदम प्रयत्‍नशील रहें।

  • स्व का बोध: अपनेपन का आधार भारतीयता 

    स्व का बोध: अपनेपन का आधार भारतीयता 

    पार्थसारथि थपलियाल

    (14 सितंबर2022 को कांस्टीट्यूशन क्लब नई दिल्ली में “लोक परम्पराओं में स्व का बोध” पुस्तक का विमोचन एवं लोकार्पण समारोह सम्पन्न हुआ। प्रस्तुत है स्व केंद्रित लोक परंपराओं पर बुद्धिशील वक्ताओं के चिंतन का सार)

    परम्पराओं में भारत की संस्कृति और जीवन मूल्य हैं- श्रीकृष्णपाल गुर्जर

    भारत सनातन और स्वतंत्र चेतना का देश है। तपस्वी ऋषियों को जो ज्ञान प्राप्त हुआ वह वेदों में है। भारत शब्द का अर्थ है ज्ञान में लगा हुआ। विष्णुपुराण और पद्मपुराण में इस भू भाग का उल्लेख है-

    उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
    वर्षं तद्भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः।

    समुद्र से उत्तर की ओर और हिमालय से दक्षिण की ओर जो भू-भाग है वह भारत है। इसमें रहनेवाली संताने भारतीय हैं। भारतीय संविधान में नागरिक शब्द है। अतः सभी नागरिक इस धरती की संतानें हैं । अथर्ववेद में कहा गया है- “माता भूमि पुत्रोहम पृथिव्या”। यह पृथ्वी मेरी माता है और मैं इसका पुत्र हूँ। इसलिए यह धरती हम सब की माता है। भारत रैन बसेरा भी नही है कि काफिले बनते गए और हिंदुस्तान बसता गया। यह पवित्रभूमि है।

    पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था भारत कोई भूमि का टुकड़ा नही है यह एक जीता जागता राष्ट्रपुरुष है। राष्ट्र के रूप की परिभाषा में कहा गया है- “अभिवर्धताम् पयसाभि राष्ट्रेण वर्धताम्”। राष्ट्र शब्द से आशय उस क्षेत्र विशेष से हैं जहां के निवासी एक संस्कृति विशेष में आबद्ध होते हैं | एक सुसमृद्ध राष्ट्र के लिए उस का स्वरुप निशित होना आवश्यक है।

    कोई भी देश एक राष्ट्र तभी हो सकता है जब उसमें सभी को आत्मसात करने की शक्ति हो। वह चाहे किसी भी धर्म, जाति तथा प्रांत का हो। राष्ट्रीय एकता राष्ट्र का महत्वपूर्ण आधारतत्व है, जो नागरिकों में पारस्परिक सम्मान, प्रेम, सद्भाव, सहयोग, धर्म, निष्ठा कर्तव्यपरायणता, सहिष्णुता तथा बंधुत्व आदि गुणों का विकास करता है तथा धर्म तथा प्रांतीयता गौण हो जाती है इन गुणों के विकास से ही राष्ट्र स्वस्थ तथा शक्तिशाली होता है। यह हमारा अपनापन है, यही स्व है। यह स्व हमारी लोकपरंपराओं में है।

    लोक परम्परराओं में स्व का बोध पुस्तक के लोकार्पण समारोह के मुख्य अतिथि केंद्र सरकार में बिजली एवं भारी उद्योग राज्यमंत्री श्री कृष्णपाल गुर्जर को परम्पराओं के माध्यम से समाज को जोड़ने का यह विचार बहुत अच्छा लगा। उन्होंने कहा हमे गुलामी की बेड़ियों से बाहर निकलना है। भारत की गौरवशाली संस्कृति और परम्पराएं रही हैं, जिनमें भहरत के जीवन मूल्य और संस्कार दिखाई देते हैं। आधुनिकता ने उन्हें भुला दिया है।

    माननीय प्रधानमंत्री जी का सपना है कि आज़ादी का अमृत महोत्सव हमनें मनाया, लेकिन अगले 25 वर्षों (अमृतकाल) में हमें अपनी गौरवशाली परम्पराओं को खोजना है, उनसे समाज को जोड़ना है। हमारी प्राचीन सोच है, लोक विश्वास है। हम केवल इहलोक की ही नही परलोक की भी सोचते हैं। हम जैसा कर्म करेंगे वैसा फल पाएंगे। समाज में धन का प्रभाव बढ़ा और धर्म का प्रभाव घटा। हमने धर्म छोड़ा धर्म ने हमें छोड़ दिया। धर्म को मानने वाले कभी पापकर्म नही कर सकते। ऐसे लोगों को राजनीति में भी आना चाहिए। ऐसा न हुआ तो एक दिन अधर्मवाले सत्ता का हरण कर लेंगे। राजनीति पर धर्म का अंकुश रहेगा तो समाज में सुधार होगा।

    उन्होंने याद दिलाया कि हमारी परंपरा थी कि रसोई में पकनेवाली पहली रोटी गाय की और आखिरी रोटी कुत्ते की होती थी। पीपल पर जल चढ़ाना, भूखे को भोजन देना, प्यासे को पानी देना, चींटी और मछली के लिए आटा देना, सर्प को दूध पिलाना जैसी परम्पराएं गायब हो रही हैं। सामाजिक सद्भाव भी घटता जा रहा है। भारत से गुलामी की निशानियाँ मिटाने के लिए समाज को आगे आना चाहिए। हाल ही में दिल्ली में राजपथ का नाम कर्तव्यपथ किया गया है। यह भारतीयता की ओर एक कदम है। हम स्वयं को पहचाने इसके लिए ज्ञान भारतीय परम्पराओं से मिलता है। हम परम्पराओं को बचाने के प्रयास करें।

  • हम सबको एक सूत्र में बांधने वाली भारतीयता के गौरव का उत्सव है गणतंत्र दिवस- राष्ट्रपति राम नाथ कोविन्द

    हम सबको एक सूत्र में बांधने वाली भारतीयता के गौरव का उत्सव है गणतंत्र दिवस- राष्ट्रपति राम नाथ कोविन्द

    समग्र समाचार सेवा
    नई दिल्ली, 25जनवरी। राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद 73वें गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्र को संबोधित किया। कोविंद ने भारत के साथ-साथ विदेशों में भी रहने वाले सभी भारतवासियों को बधाई दी और कहा कि हम सबको एक सूत्र में बांधने वाली भारतीयता के गौरव का यह उत्सव है। सन 1950 में आज ही के दिन हम सब की इस गौरवशाली पहचान को औपचारिक स्वरूप प्राप्त हुआ था। उस दिन, भारत विश्व के सबसे बड़े गणतंत्र के रूप में स्थापित हुआ और हम, भारत के लोगों ने एक ऐसा संविधान लागू किया जो हमारी सामूहिक चेतना का जीवंत दस्तावेज है। हमारे विविधतापूर्ण और सफल लोकतंत्र की सराहना पूरी दुनिया में की जाती है। हर साल गणतंत्र दिवस के दिन हम अपने गतिशील लोकतन्त्र तथा राष्ट्रीय एकता की भावना का उत्सव मनाते हैं। महामारी के कारण इस वर्ष के उत्सव में धूम-धाम भले ही कुछ कम हो परंतु हमारी भावना हमेशा की तरह सशक्त है।
    गणतन्त्र दिवस का यह दिन उन महानायकों को याद करने का अवसर भी है जिन्होंने स्वराज के सपने को साकार करने के लिए अतुलनीय साहस का परिचय दिया तथा उसके लिए देशवासियों में संघर्ष करने का उत्साह जगाया। दो दिन पहले, 23 जनवरी को हम सभी देशवासियों ने ‘जय-हिन्द’ का उद्घोष करने वाले नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की 125वीं जयंती पर उनका पुण्य स्मरण किया है। स्वाधीनता के लिए उनकी ललक और भारत को गौरवशाली बनाने की उनकी महत्वाकांक्षा हम सबके लिए प्रेरणा का स्रोत है।
    हम अत्यंत सौभाग्यशाली हैं कि हमारे संविधान का निर्माण करने वाली सभा में उस दौर की सर्वश्रेष्ठ विभूतियों का प्रतिनिधित्व था। वे लोग हमारे महान स्वाधीनता संग्राम के प्रमुख ध्वज-वाहक थे। लंबे अंतराल के बाद, भारत की राष्ट्रीय चेतना का पुनर्जागरण हो रहा था। इस प्रकार, वे असाधारण महिलाएं और पुरुष एक नई जागृति के अग्रदूत की भूमिका निभा रहे थे। उन्होंने संविधान के प्रारूप के प्रत्येक अनुच्छेद, वाक्य और शब्द पर, सामान्य जन-मानस के हित में, विस्तृत चर्चा की। वह विचार-मंथन लगभग तीन वर्ष तक चला। अंततः, डॉक्टर बाबासाहब आम्बेडकर ने प्रारूप समिति के अध्यक्ष की हैसियत से, संविधान को आधिकारिक स्वरूप प्रदान किया। और वह हमारा आधारभूत ग्रंथ बन गया।
    यद्यपि हमारे संविधान का कलेवर विस्तृत है क्योंकि उसमें, राज्य के काम-काज की व्यवस्था का भी विवरण है। लेकिन संविधान की संक्षिप्त प्रस्तावना में लोकतंत्र, न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के मार्गदर्शक सिद्धांत, सार-गर्भित रूप से उल्लिखित हैं। इन आदर्शों से उस ठोस आधारशिला का निर्माण हुआ है जिस पर हमारा भव्य गणतंत्र मजबूती से खड़ा है। इन्हीं जीवन-मूल्यों में हमारी सामूहिक विरासत भी परिलक्षित होती है।
    इन जीवन-मूल्यों को, मूल अधिकारों तथा नागरिकों के मूल कर्तव्यों के रूप में हमारे संविधान द्वारा बुनियादी महत्व प्रदान किया गया है। अधिकार और कर्तव्य एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। संविधान में उल्लिखित मूल कर्तव्यों का नागरिकों द्वारा पालन करने से मूल अधिकारों के लिए समुचित वातावरण बनता है। आह्वान किए जाने पर राष्ट्र की सेवा करने के मूल कर्तव्य को निभाते हुए हमारे करोड़ों देशवासियों ने स्वच्छता अभियान से लेकर कोविड टीकाकरण अभियान को जन-आंदोलन का रूप दिया है। ऐसे अभियानों की सफलता का बहुत बड़ा श्रेय हमारे कर्तव्य-परायण नागरिकों को जाता है। मुझे विश्वास है कि हमारे देशवासी इसी कर्तव्य-निष्ठा के साथ राष्ट्र हित के अभियानों को अपनी सक्रिय भागीदारी से मजबूत बनाते रहेंगे।

    राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद ने कहा कि भारत का संविधान 26 नवंबर, 1949 को संविधान सभा द्वारा अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित किया गया। उस दिन को हम संविधान दिवस के रूप में मनाते हैं। उसके दो महीने बाद 26 जनवरी, 1950 से हमारा संविधान पूर्णतः प्रभावी हुआ। ऐसा सन 1930 के उस दिन को यादगार बनाने के लिए किया गया था जिस दिन भारतवासियों ने पूरी आजादी हासिल करने का संकल्प लिया था। सन 1930 से 1947 तक, हर साल 26 जनवरी को ‘पूर्ण स्वराज दिवस’ के रूप में मनाया जाता था, अतः यह तय किया गया कि उसी दिन से संविधान को पूर्णत: प्रभावी बनाया जाए।
    सन 1930 में महात्मा गांधी ने देशवासियों को ‘पूर्ण स्वराज दिवस’ मनाने का तरीका समझाया था। उन्होंने कहा था :
    “… चूंकि हम अपने ध्येय को अहिंसात्मक और सच्चे उपायों से ही प्राप्त करना चाहते हैं, और यह काम हम केवल आत्म-शुद्धि के द्वारा ही कर सकते हैं, इसलिए हमें चाहिए कि उस दिन हम अपना सारा समय यथाशक्ति कोई रचनात्मक कार्य करने में बिताएं।”

    यथाशक्ति रचनात्मक कार्य करने का गांधीजी का यह उपदेश सदैव प्रासंगिक रहेगा। उनकी इच्छा के अनुसार गणतंत्र दिवस का उत्सव मनाने के दिन और उसके बाद भी, हम सब की सोच और कार्यों में रचनात्मकता होनी चाहिए। गांधीजी चाहते थे कि हम अपने भीतर झांक कर देखें, आत्म-निरीक्षण करें और बेहतर इंसान बनने का प्रयास करें, और उसके बाद बाहर भी देखें, लोगों के साथ सहयोग करें और एक बेहतर भारत तथा बेहतर विश्व के निर्माण में अपना योगदान करें।
    राष्ट्रपति ने कहा कि मानव-समुदाय को एक-दूसरे की सहायता की इतनी जरूरत कभी नहीं पड़ी थी जितनी कि आज है। अब दो साल से भी अधिक समय बीत गया है लेकिन मानवता का कोरोना-वायरस के विरुद्ध संघर्ष अभी भी जारी है। इस महामारी में हजारों लोगों को जान से हाथ धोना पड़ा है। पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था पर आघात हुआ है। विश्व समुदाय को अभूतपूर्व विपदा का सामना करना पड़ा है। नित नए रूपों में यह वायरस नए संकट प्रस्तुत करता रहा है। यह स्थिति, मानव जाति के लिए एक असाधारण चुनौती बनी हुई है।
    महामारी का सामना करना भारत में अपेक्षाकृत अधिक कठिन होना ही था। हमारे देश में जनसंख्या का घनत्व बहुत ज्यादा है, और विकासशील अर्थव्यवस्था होने के नाते हमारे पास इस अदृश्य शत्रु से लड़ने के लिए उपयुक्त स्तर पर बुनियादी ढांचा तथा आवश्यक संसाधन पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं थे। लेकिन ऐसे कठिन समय में ही किसी राष्ट्र की संघर्ष करने की क्षमता निखरती है। मुझे यह कहते हुए गर्व का अनुभव होता है कि हमने कोरोना-वायरस के खिलाफ असाधारण दृढ़-संकल्प और कार्य-क्षमता का प्रदर्शन किया है। पहले वर्ष के दौरान ही, हमने स्वास्थ्य सेवा के बुनियादी ढांचे को विस्तृत तथा मजबूत बनाया और दूसरे देशों की मदद के लिए भी आगे बढ़े। दूसरे वर्ष तक, हमने स्वदेशी टीके विकसित कर लिए और विश्व इतिहास में सबसे बड़ा टीकाकरण अभियान शुरू कर दिया। यह अभियान तेज गति से आगे बढ़ रहा है। हमने अनेक देशों को वैक्सीन तथा चिकित्सा संबंधी अन्य सुविधाएं प्रदान कराई हैं। भारत के इस योगदान की वैश्विक संगठनों ने सराहना की है।
    दुर्भाग्य से, संकट की स्थितियां आती रही हैं, क्योंकि वायरस, अपने बदलते स्वरूपों में वापसी करता रहा है। अनगिनत परिवार, भयानक विपदा के दौर से गुजरे हैं। हमारी सामूहिक पीड़ा को व्यक्त करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं। लेकिन एकमात्र सांत्वना इस बात की है कि बहुत से लोगों की जान बचाई जा सकी है। महामारी का प्रभाव अभी भी व्यापक स्तर पर बना हुआ है, अतः हमें सतर्क रहना चाहिए और अपने बचाव में तनिक भी ढील नहीं देनी चाहिए। हमने अब तक जो सावधानियां बरती हैं, उन्हें जारी रखना है। मास्क पहनना और सोशल डिस्टेंसिंग बनाए रखना कोविड-अनुरूप व्यवहार के अनिवार्य अंग रहे हैं। कोविड महामारी के खिलाफ लड़ाई में वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों द्वारा बताई गई सावधानियों का पालन करना आज हर देशवासी का राष्ट्र-धर्म बन गया है। यह राष्ट्र-धर्म हमें तब तक निभाना ही है, जब तक यह संकट दूर नहीं हो जाता।
    संकट की इस घड़ी में हमने यह देखा है कि कैसे हम सभी देशवासी एक परिवार की तरह आपस में जुड़े हुए हैं। सोशल डिस्टेंसिंग के कठिन दौर में हम सबने एक-दूसरे के साथ निकटता का अनुभव किया है। हमने महसूस किया है कि हम एक-दूसरे पर कितना निर्भर करते हैं। कठिन परिस्थितियों में लंबे समय तक काम करके, यहां तक ​​​​कि मरीजों की देखभाल के लिए अपनी जान जोखिम में डाल कर भी डॉक्टरों, नर्सों और पैरामेडिक्स ने मानवता की सेवा की है। बहुत से लोगों ने देश में गतिविधियों को सुचारु रूप से जारी रखने के लिए यह सुनिश्चित किया है कि अनिवार्य सुविधाएं उपलब्ध रहें तथा सप्लाई-चेन में रुकावट न पैदा हो। केंद्र और राज्य स्तर पर जन-सेवकों, नीति-निर्माताओं, प्रशासकों और अन्य लोगों ने समयानुसार कदम उठाए हैं।
    इन प्रयासों के बल पर हमारी अर्थ-व्यवस्था ने फिर से गति पकड़ ली है। प्रतिकूल परिस्थितियों में भारत की दृढ़ता का यह प्रमाण है कि पिछले साल आर्थिक विकास में आई कमी के बाद इस वित्त वर्ष में अर्थ-व्यवस्था के प्रभावशाली दर से बढ़ने का अनुमान है। यह पिछले वर्ष शुरू किए गए आत्मनिर्भर भारत अभियान की सफलता को भी दर्शाता है। सभी आर्थिक क्षेत्रों में सुधार लाने और आवश्यकता-अनुसार सहायता प्रदान करने हेतु सरकार निरंतर सक्रिय रही है। इस प्रभावशाली आर्थिक प्रदर्शन के पीछे कृषि और मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्रों में हो रहे बदलावों का प्रमुख योगदान है। मुझे यह जानकर प्रसन्नता हुई है कि हमारे किसान, विशेषकर छोटी जोत वाले युवा किसान प्राकृतिक खेती को उत्साह-पूर्वक अपना रहे हैं।
    लोगों को रोजगार देने तथा अर्थ-व्यवस्था को गति प्रदान करने में छोटे और मझोले उद्यमों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हमारे इनोवेटिव युवा उद्यमियों ने स्टार्ट-अप ईको-सिस्टम का प्रभावी उपयोग करते हुए सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित किए हैं। हमारे देश में विकसित, विशाल और सुरक्षित डिजिटल पेमेंट प्लेटफॉर्म की सफलता का एक उदाहरण यह है कि हर महीने करोड़ों की संख्या में डिजिटल ट्रांज़ेक्शन किए जा रहे हैं।
    जन-संसाधन से लाभ उठाने यानि डेमोग्राफिक डिविडेंड प्राप्त करने के लिए, हमारे पारंपरिक जीवन-मूल्यों एवं आधुनिक कौशल के आदर्श संगम से युक्त राष्ट्रीय शिक्षा नीति के जरिये सरकार ने समुचित वातावरण उपलब्ध कराया है। मुझे यह जानकर प्रसन्नता हो रही है कि विश्व में सबसे ऊपर की 50 ‘इनोवेटिव इकॉनोमीज़’ में भारत अपना स्थान बना चुका है। यह उपलब्धि और भी संतोषजनक है कि हम व्यापक समावेश पर जोर देने के साथ-साथ योग्यता को बढ़ावा देने में सक्षम हैं।

    देशप्रेम की भावना देशवासियों की कर्तव्य-निष्ठा को और मजबूत बनाती है। चाहे आप डॉक्टर हों या वकील, दुकानदार हों या ऑफिस-वर्कर, सफाई कर्मचारी हों या मजदूर, अपने कर्तव्य का निर्वहन निष्ठा व कुशलता से करना देश के लिए आपका प्राथमिक और सबसे महत्वपूर्ण योगदान है।
    सशस्त्र बलों के सर्वोच्च कमांडर के रूप में, मुझे यह उल्लेख करते हुए प्रसन्नता हो रही है कि यह वर्ष सशस्त्र बलों में महिला सशक्तीकरण की दृष्टि से विशेष महत्वपूर्ण रहा है। हमारी बेटियों ने परंपरागत सीमाओं को पार किया है, और अब नए क्षेत्रों में महिला अधिकारियों के लिए स्थायी कमीशन की सुविधा आरंभ हो गई है। साथ ही, सैनिक स्कूलों तथा सुप्रतिष्ठित नेशनल डिफेंस एकेडमी से महिलाओं के आने का मार्ग प्रशस्त होने से सेनाओं की टैलेंट-पाइपलाइन तो समृद्ध होगी ही, हमारे सशस्त्र बलों को बेहतर जेन्डर बैलेंस का लाभ भी मिलेगा।
    मुझे विश्वास है कि भविष्य की चुनौतियों का सामना करने के लिए भारत आज बेहतर स्थिति में है। इक्कीसवीं सदी को जलवायु परिवर्तन के युग के रूप में देखा जा रहा है और भारत ने अक्षय ऊर्जा के लिए अपने साहसिक और महत्वाकांक्षी लक्ष्यों के साथ विश्व-मंच पर नेतृत्व की स्थिति बनाई है। निजी स्तर पर, हम में से प्रत्येक व्यक्ति गांधीजी की सलाह के अनुरूप अपने आसपास के परिवेश को सुधारने में अपना योगदान कर सकता है। भारत ने सदैव समस्त विश्व को एक परिवार ही समझा है। मुझे विश्वास है कि विश्व बंधुत्व की इसी भावना के साथ हमारा देश और समस्त विश्व समुदाय और भी अधिक समरस तथा समृद्ध भविष्य की ओर आगे बढ़ेंगे।

    राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद ने कहा कि हमारी सभ्यता प्राचीन है परन्तु हमारा यह गणतंत्र नवीन है। राष्ट्र निर्माण हमारे लिए निरंतर चलने वाला एक अभियान है। जैसा एक परिवार में होता है, वैसे ही एक राष्ट्र में भी होता है कि एक पीढ़ी अगली पीढ़ी का बेहतर भविष्य सुनिश्चित करने के लिए कड़ी मेहनत करती है। जब हमने आज़ादी हासिल की थी, उस समय तक औपनिवेशिक शासन के शोषण ने हमें घोर गरीबी की स्थिति में डाल दिया था। लेकिन उसके बाद के पचहत्तर वर्षों में हमने प्रभावशाली प्रगति की है। अब युवा पीढ़ी के स्वागत में अवसरों के नए द्वार खुल रहे हैं। हमारे युवाओं ने इन अवसरों का लाभ उठाते हुए सफलता के नए प्रतिमान स्थापित किए हैं। मुझे विश्वास है कि इसी ऊर्जा, आत्म-विश्वास और उद्यमशीलता के साथ हमारा देश प्रगति पथ पर आगे बढ़ता रहेगा तथा अपनी क्षमताओं के अनुरूप, विश्व समुदाय में अपना अग्रणी स्थान अवश्य प्राप्त करेगा।