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  • पर्यावरण, सामाजिक या सुशासन की योजनाओं के लिये कोष प्रबंधन निकायों द्वारा स्पष्टीकरण देने का प्रारूप

    पर्यावरण, सामाजिक या सुशासन की योजनाओं के लिये कोष प्रबंधन निकायों द्वारा स्पष्टीकरण देने का प्रारूप

    समग्र समाचार सेवा
    नई दिल्ली, 19जनवरी। अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र प्राधिकरण (आईएफएससीए), विभिन्न स्थायी वित्त संबंधी गतिविधियों के केंद्र के रूप में गिफ्ट-आईएफएससी स्थापित करने के उद्देश्य के उद्देश्य से निम्नलिखित नियामक ढांचे/आवश्यकताओं को पहले ही जारी/अधिसूचित कर चुका है:

    ग्रीन बॉन्ड्स, सोशल बॉन्ड्स, सस्टेनेबिलिटी बॉन्ड्स और सस्टेनेबिलिटी लिंक्ड बॉन्ड्स का खुलासा और उन्हें सूचीबद्ध करना
    50 मिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक बाजार पूंजीकरण वाली सूचीबद्ध कंपनियों द्वारा निरंतरता सूचना
    आईबीयू और वित्त कंपनियों के पास टिकाऊ वित्तपोषण पर बोर्ड द्वारा अनुमोदित ढांचा होना चाहिए और उनकी ऋण संपत्ति का कम से कम 5 प्रतिशत स्थायी क्षेत्रों के लिए होना चाहिए
    3 बिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक कॉर्पस/एयूएम का प्रबंधन करने वाली निधि प्रबंधन संस्थाओं द्वारा निरंतरता का खुलासा
    अपने निवेश के सामाजिक और पारिस्थिति सम्बंधी प्रभाव के बारे में बढ़ती निवेशक जागरूकता का लाभ उठाने के लिए, विश्व स्तर पर परिसंपत्ति प्रबंधक, स्थायित्व पहलुओं से संबंधित निवेश उत्पादों की पेशकश पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। ब्लूमबर्ग इंटेलिजेंस के अनुसार, 2025 तक, विश्व स्तर पर प्रबंधन के तहत एक तिहाई से अधिक संपत्ति ईएसजी से संबंधित होगी।

    ईएसजी योजनाओं से संबंधित स्पष्टीकरण में निरंतरता, तुलनात्मकता और विश्वसनीयता को बढ़ावा देने सहित यह सुनिश्चित करने के लिए कि आईएफएससी में ईएसजी योजनाएं अपने लेबल के अनुरूप हैं, आईएफएससीए ने आज एक परिपत्र जारी किया है। इस परिपत्र में ईएसजी योजनाओं को कुछ प्रारंभिक और सामयिक स्पष्टीकरण करने की आवश्यकता है। इसके अलावा, चल रही निगरानी और प्रदर्शन मूल्यांकन के लिए मानदंड निर्धारित किए गए हैं। आईएफएससी द्वारा निर्धारित रूपरेखा सिद्धांत-आधारित है, और बड़े पैमाने पर अंतर्राष्ट्रीय उत्कृष्ट व्यवहारों के अनुरूप है। इसके अलावा, विनियामक अपेक्षाओं को निर्धारित करने के लिए, आईएफएससी ने विस्तृत दिशा-निर्देश भी उपलब्ध कराये हैं।

    सर्कुलर के विशेष बिंदु इस प्रकार हैं:

    1. प्रायोज्यता: परिपत्र ऐसी खुदरा योजनाओं, एक्सचेंज ट्रेडेड फंड्स (ईटीएफ), प्रतिबंधित योजनाओं और उद्यम पूंजी योजनाओं पर लागू होता है, जो:

    ‘पर्यावरण’, ‘सामाजिक’, ‘ईएसजी’, ‘ग्रीन’, ‘स्थिरता’ या उनके किसी भी संयोजन या इसी तरह की शर्तों को उनके नाम में शामिल किया गया है, या
    ईएसजी केंद्रित योजनाओं के रूप में वे खुद का प्रतिनिधित्व या विपणन करें।
    आरम्भिक स्पष्टीकरणः किसी एफएमई द्वारा लॉन्च की गई प्रत्येक ईएसजी योजना के लिये एफएमई को निम्नलिखित को सुनिश्चित करना होगाः

    योजना का नाम: ईएसजी योजना का नाम उसके ईएसजी को परिलक्षित करता है। ईएसजी से संबंधित निवेश उद्देश्यों और निवेश रणनीति के अनुरूप होना चाहिए।
    निवेश उद्देश्य: एफएमई को योजना के ईएसजी से संबंधित निवेश उद्देश्यों की प्रकृति और सीमा का पारदर्शी रूप से खुलासा करना चाहिए, जिसमें योजना की निरंतरता के प्राथमिक घटकों का विवरण शामिल है।
    निवेश रणनीति: ईएसजी से संबंधित निवेश रणनीति सहित एफएमई द्वारा लक्षित कुल निवेश रणनीति के प्रकार की विस्तृत व्याख्या, दूसरों के बीच एकीकरण, प्रभाव निवेश, जुड़ाव, कठिन-से-कम और अन्य उत्सर्जन-गहन क्षेत्रों के लिए संक्रमण की दिशा में पहल हो सकती है।
    निवेश प्रक्रियायें: एफएमई, ईएसजी निवेशों के लिए प्रासंगिक समझी जाने वाली प्रक्रियाओं के लिए कार्यप्रणाली को प्रस्तुत करेगा (विशेष रूप से प्रारंभिक निवेश, निगरानी, ​​जुड़ाव और निकास के लिए)।
    जोखिम और जोखिम प्रबंधन व्यवहारः ईएसजी योजना का प्रबंधन करने वाले एफएमई को उन सभी विशिष्ट जोखिमों का खुलासा करना चाहिए जो योजना द्वारा सामना किए गए अन्य सभी भौतिक जोखिमों के अलावा ईएसजी से संबंधित निवेश उद्देश्यों, संबंधित निवेश रणनीतियों और प्रक्रियाओं के कारण उत्पन्न होते हैं।
    बेंचमार्क: जहां भी संभव हो, एफएमई ईएसजी योजना के लिए अपने ईएसजी द्वारा लक्ष्य की प्राप्ति और/या बेंचमार्क की तुलना में वित्तीय प्रदर्शन को मापने के लिए एक संदर्भ बेंचमार्क लागू कर सकता है।
    ईएसजी योजनाओं के लिए समय-समय पर स्पष्टीकरण: एफएमई द्वारा शुरू की गई प्रत्येक ईएसजी योजना के लिए यह प्राधिकरण, निवेशकों को एकल योजना के लिए अर्ध-वार्षिक आधार पर और अन्य प्रकार की योजनाओं के लिए वार्षिक आधार पर, अनुपालन का खुलासा करेगा। योजना के ईएसजी-संबंधित निवेश उद्देश्य, ईएसजी-संबंधित प्रदर्शन, निवेश योग्य निधि का वास्तविक अनुपात/कथित ईएसजी-संबंधित निवेश उद्देश्यों के अनुसार प्रबंधन के तहत संपत्ति के निवेश, मुख्य निष्कर्ष/आंतरिक लेखा-परीक्षण या तीसरे पक्ष के सत्यापन के प्रमुख अवलोकन, यदि कोई हो, आदि को शामिल किया गया है।
    निगरानी और अनुपालन: एफएमई को एकल योजना के लिए अर्ध-वार्षिक आधार पर और अन्य प्रकार की योजनाओं के लिए वार्षिक आधार पर योजनाओं के घोषित ईएसजी-संबंधित निवेश उद्देश्यों के साथ उनके अनुपालन का आकलन करेगा। इसके अलावा, ईएसजी-सम्बंधी प्रदर्शन का मूल्यांकन पूर्व निर्धारित केपीआई के जरिये किया जायेगा। साथ ही मूल्यांकन के अपेक्षित परिणामों और अन्य प्रासंगिक कारकों को घोषित किया जायेगा।
    ईएसजी योजनाओं के लिये विस्तृत प्रारूप को यहां देखा जा सकता हैः https://ifsca.gov.in/Circular

    आईएफएससीए इस प्रारूप के साथ ईएसजी योजनाओं को लॉन्च करने और उनका प्रबंधन करने वाले एफएमई के ​​लिए मानकों और व्यवहारों (मार्गदर्शन सहित) को निर्धारित करता है। ईएसजी निवेश परिदृश्य के चल रहे विकास को देखते हुए, आईएफसीए इस क्षेत्र में विकास की निगरानी करना जारी रखेगा और प्राप्त अनुभव के आधार पर समय-समय पर इस परिपत्र को ताजा/अपडेट कर सकता है।

  • प्रकृति ने हमें भरपूर उपहार दिया है और पर्यावरण के प्रति संवेदनशील और उत्तरदायी बनना हममें से प्रत्येक का कर्तव्य है- राष्ट्रपति मुर्मु

    प्रकृति ने हमें भरपूर उपहार दिया है और पर्यावरण के प्रति संवेदनशील और उत्तरदायी बनना हममें से प्रत्येक का कर्तव्य है- राष्ट्रपति मुर्मु

    समग्र समाचार सेवा
    नई दिल्ली, 21दिसंबर। भारतीय वन सेवा के परिवीक्षाधीनों ने आज 21 दिसंबर, 2022 को राष्ट्रपति भवन में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु से भेंट की।

    अधिकारियों को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि वन पृथ्वी पर सभी जीवधारियों के लिए आश्रयस्थल हैं। वन आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने एवं कार्बन के बड़े अवशोषक के रूप में कार्य करने के अलावा उनकी भूमिका वन्यजीवों का आवास बनने और आजीविका स्रोत होने से भिन्न होती है। वन विश्व की कई लुप्तप्राय प्रजातियों का घर भी हैं। लघु वनोपज हमारे देश में 27 करोड़ से अधिक लोगों की आजीविका का समर्थन करते हैं। वनों का उच्च औषधीय महत्व भी है।

    राष्ट्रपति ने कहा कि भारत वन में रहने वाले समुदायों के अधिकारों पर विशेष ध्यान दे रहा है। जनजातीय समुदायों सहित वनवासियों के साथ सहजीवी संबंध को अब व्यापक रूप से मान्यता प्राप्त है और यह हमारे विकास विकल्पों में शामिल है। भारतीय वन सेवा के अधिकारियों का उत्तरदायित्व है कि वे इन समुदायों को जैव-विविधता के संरक्षण और संरक्षण के प्रति उनके अधिकारों एवं कर्तव्यों के बारे में जागरूक करें।

    राष्ट्रपति ने कहा कि इन दिनों हम भारत और विश्व के विभिन्न भागों में वनों में आग लगने की कई घटनाओं के बारे में सुनते हैं। हमारे सामने न केवल वनों के संरक्षण की बल्कि जलवायु परिवर्तन से निपटने की भी बड़ी चुनौती है। आज हमारे पास शहरी वानिकी, वन जोखिम शमन, डेटा संचालित वन प्रबंधन और जलवायु-स्मार्ट वन अर्थव्यवस्थाओं की नई प्रौद्योगिकियां और अवधारणाएं हैं। उन्होंने भारतीय वन सेवा के अधिकारियों से कहा की वे भारत के वन संसाधनों के सतत प्रबंधन के लिए नवाचार करें और नए तरीके खोजें। उन्होंने कहा कि उन्हें हमारे वनों को ऐसी अवैध गतिविधियों से बचाने में प्रभावी भूमिका निभानी चाहिए जिनका नकारात्मक आर्थिक और पर्यावरणीय प्रभाव पड़ता है।

    राष्ट्रपति ने कहा कि देश के सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक विकास के लिए वन आवश्यक हैं। हमें अपने वनों को जीवंत एवं स्वस्थ रखना चाहिए। विकास आवश्यक है और इसके साथ स्थायित्व भी आवश्यक है। प्रकृति ने हमें भरपूर उपहार दिए हैं तथा यह हममें से प्रत्येक का कर्तव्य है कि हम पर्यावरण के प्रति संवेदनशील और उत्तरदायी बनें। हमें अपनी आने वाली पीढ़ियों को पुनर्जीवित प्राकृतिक संसाधनों और स्थायी पारिस्थितिक तंत्र के साथ एक सुंदर देश का उपहार देना होगा।

  • पर्यावरण की रक्षा करके हम कई मानवाधिकारों की रक्षा कर सकते हैं: राष्ट्रपति मुर्मु

    पर्यावरण की रक्षा करके हम कई मानवाधिकारों की रक्षा कर सकते हैं: राष्ट्रपति मुर्मु

    समग्र समाचार सेवा
    नई दिल्ली, 14दिसंबर। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने राष्ट्रीय ऊर्जा संरक्षण दिवस के अवसर पर आज नई दिल्ली में राष्ट्रीय ऊर्जा संरक्षण पुरस्कार, राष्ट्रीय ऊर्जा दक्षता नवाचार पुरस्कार और राष्ट्रीय चित्रकला प्रतियोगिता पुरस्कार प्रदान किए। उन्होंने इस अवसर पर ‘ईवी-यात्रा पोर्टल’ का भी शुभारंभ किया। ऊर्जा दक्षता ब्यूरो द्वारा निकटतम सार्वजनिक ईवी चार्जर के लिए इन-व्हीकल नेविगेशन की सुविधा के लिए ‘ईवी-यात्रा पोर्टल’ विकसित किया गया है।

    उपस्थित जनसमूह को संबोधित करते हुए, राष्ट्रपति ने कहा कि यह सुनिश्चित करना हम सभी के लिए सर्वोच्च प्राथमिकता है कि आने वाली पीढ़ियां प्रदूषण मुक्त वातावरण में सांस ले सकें, अच्छी प्रगति कर सकें और स्वस्थ जीवन जिएं। उन्‍होंने कहा कि स्वच्छ वातावरण में सांस लेना एक बुनियादी मानवाधिकार है। पर्यावरण की रक्षा करके हम अनेक मानवाधिकारों की रक्षा कर सकते हैं।

    राष्ट्रपति ने कहा कि जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग की चुनौतियों का सामना करते हुए ऊर्जा संरक्षण एक वैश्विक और राष्ट्रीय प्राथमिकता है। यद्यपि भारत का प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन और ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन विश्व औसत के एक तिहाई से भी कम है, फिर भी एक जिम्मेदार देश के रूप में भारत पर्यावरण संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है।

    राष्ट्रपति ने कहा कि सीओपी-26 में भारत ने ‘लाइफस्टाइल फॉर एनवायरनमेंट’ यानी पर्यावरण के अनुकूल जीवन शैली का संदेश दिया था, जिसमें विश्व समुदाय से पर्यावरण के अनुकूल जीवन शैली अपनाने का आग्रह किया था। भारतीय संस्कृति और परंपरा में, हमारी जीवनशैली हमेशा लाईफ के संदेश के अनुरूप रही है। प्रकृति का सम्मान करना, प्राकृतिक संसाधनों को बर्बाद न करना और प्राकृतिक संपदा को बढ़ाने के उपाय करना ऐसी जीवन शैली का अभिन्न अंग है। उन्होंने कहा कि भारत इस तरह की जीवन शैली को अपनाने की दिशा में पूरे विश्व समुदाय को आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहा है।

    जी-20 में भारत की अध्यक्षता का उल्‍लेख करते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि जी-20 देश, दुनिया की कुल जीडीपी में 85 प्रतिशत और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में 75 प्रतिशत का योगदान करते हैं। इसके अलावा दुनिया की 60 फीसदी आबादी भी जी-20 देशों में निवास करती है। उन्होंने कहा कि भारत ने अपनी अध्यक्षता के दौरान ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ के आदर्श के अनुसार ‘एक पृथ्वी, एक परिवार, एक भविष्य’ के विषय को अपनाया है और हम इसे विश्व पटल पर प्रचारित भी कर रहे हैं.

    राष्ट्रपति ने सभी पुरस्कार विजेताओं, विशेषकर बच्चों और राष्ट्रीय ऊर्जा दक्षता नवाचार पुरस्कार के विजेताओं की उनकी नवीन सोच और कार्यप्रणाली के लिए सराहना की। उन्होंने कहा कि उनके नवाचारों का व्यापक रूप से उपयोग किया जाना चाहिए, ताकि अधिक से अधिक लोग प्रेरित हो सकें और पर्यावरण संरक्षण के नए तरीके विकसित कर सकें। राष्‍ट्रपति ने सभी से संकल्प लेने का आग्रह किया कि हम जो कुछ भी करेंगे वह हमेशा प्रकृति के पक्ष में होगा, प्रकृति के खिलाफ कभी नहीं होगा। उन्होंने कहा कि प्रकृति और विकास के बीच संतुलन बनाए रखने में ही मानव कल्याण निहित है।

  • केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री श्री भूपेंद्र यादव ने सीओपी-27 के समापन सत्र को संबोधित किया

    केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री श्री भूपेंद्र यादव ने सीओपी-27 के समापन सत्र को संबोधित किया

    समग्र समाचार सेवा
    नई दिल्ली, 20नवंबर।यूएनएफसीसीसी की पार्टियों के सम्मेलन (सीओपी 27) के 27वें सत्र का समापन आज शर्म अल-शेख में आयोजित किया गया। यह सम्मेलन विश्‍व के सामूहिक जलवायु लक्ष्‍यों को हासिल करने की दिशा में कार्रवाई करने के लिए एक मंच पर आए देशों के साथ पिछली सफलताओं का उल्‍लेख करने और भविष्य की महत्वाकांक्षा का मार्ग प्रशस्त करने के दृष्टिकोण से आयोजित किया गया था। भारतीय शिष्‍ट प्रतिनिधिमंडल के नेता और केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री श्री भूपेंद्र यादव ने अपना संबोधन दिया।

    श्रीमान राष्ट्रपति जी,
    आप एक ऐतिहासिक सीओपी की अध्यक्षता कर रहे हैं जिसमें हानि और क्षति निधि की व्‍यवस्‍था सहित हानि और क्षति निधि व्यवस्था सुनिश्चित करने के लिए समझौता किया गया है। दुनिया ने इसके लिए बहुत लंबे समय तक प्रतीक्षा की है। इस बारे में आम सहमति बनाने के लिए आपने जो अथक प्रयास किए हैं उसके लिए हम आपको बधाई देते हैं।

    हम सुरक्षा निर्णय में जलवायु परिवर्तन से निपटने के अपने प्रयासों में सतत जीवन शैलियों और खपत और उत्पादन के टिकाऊ पैटर्न की व्‍यवस्‍था को शामिल करने का भी स्वागत करते हैं।

    हम इस बारे में ध्यान दें कि हम कृषि और खाद्य सुरक्षा में जलवायु कार्रवाई के बारे में चार वर्ष काम करने का कार्यक्रम स्थापित कर रहे हैं।

    कृषि लाखों छोटे किसानों की आजीविका का मुख्य आधार है जो जलवायु परिवर्तन से बुरी तरह से प्रभावित होगी। इसलिए हमें उन पर शमन जिम्मेदारियों का बोझ नहीं डालना चाहिए।

    वास्‍तव में भारत ने अपनी कृषि में बदलाव को अपने राष्‍ट्रीय स्‍तर पर निर्धारित योगदान (एनडीसी) से बाहर रखा है।

    हम सिर्फ ब‍दलाव पर काम करने का कार्यक्रम भी स्थापित कर रहे हैं।

    अधिकांश विकासशील देशों के लिए केवल बदलाव की तुलना डीकार्बोनाइजेशन से नहीं, बल्कि निम्न-कार्बन विकास से की जा सकती है।

    विकासशील देशों को अपनी पसंद के ऊर्जा मिश्रण और एसडीजी को प्राप्त करने में स्वतंत्रता दिए जाने की आवश्यकता है।

    इसलिए विकसित देशों का जलवायु कार्रवाई में नेतृत्व प्रदान करना वैश्विक न्यायोचित परिवर्तन का एक बहुत ही महत्वपूर्ण पहलू है।

    धन्यवाद श्रीमान राष्ट्रपति जी।

  • फिनलैंड के शिक्षा व संस्कृति मंत्री श्री पेट्री होंकोनेन ने डॉ. जितेंद्र सिंह से उनके नॉर्थ ब्लॉक स्थित कार्यालय में मुलाकात की

    फिनलैंड के शिक्षा व संस्कृति मंत्री श्री पेट्री होंकोनेन ने डॉ. जितेंद्र सिंह से उनके नॉर्थ ब्लॉक स्थित कार्यालय में मुलाकात की

    समग्र समाचार सेवा
    नई दिल्ली, 14नवंबर।फिनलैंड के शिक्षा व संस्कृति मंत्री पेट्री होंकोनेन ने आज नॉर्थ ब्लॉक में केंद्रीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह से मुलाकात की। इसका उद्देश्य विज्ञान, प्रौद्योगिकी व नवाचार (एसटीआई) के क्षेत्र में दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय सहयोग को बढ़ाना है।

    पेट्री होंकानेन के साथ एक उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल भी भारत आया हुआ है। इसने बाद में दोनों मंत्रियों की उपस्थिति में भारतीय प्रतिनिधिमंडल के साथ एक अलग बैठक की।

    वहीं, डॉ. जितेंद्र सिंह ने स्टार्टअप्स में भी सहयोग पर भारत की प्राथमिकता को दोहराया। फिनलैंड के मंत्री ने कोविड महामारी के प्रबंधन के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की प्रशंसा की। इसके साथ ही उन्होंने टीके के विकास और सभी देशवासियों के लिए टीकाकरण को सुनिश्चित करने को लेकर भारत सरकार के प्रयासों की भी प्रशंसा की।

    भारत और फिनलैंड द्विपक्षीय और वैश्विक हितों से संबंधित कई क्षेत्रों में आपसी सहभागिता को एक नए स्तर पर ले जाने पर सहमत हुए। दोनों देशों ने फ्यूचर आईसीटी, फ्यूचर मोबाइल प्रौद्योगिकी और डिजिटल शिक्षा जैसे क्षेत्रों में डिजिटल भागीदारी को लेकर सहयोग को बढ़ाने का निर्णय किया। इसके अलावा दोनों देशों ने आपसी हित के क्षेत्रों पर संयुक्त कार्य समूहों को संस्थागत बनाने पर भी जोर दिया।

    केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह और पेट्री होंकोनेन ने इन बातों का उल्लेख किया। फिनलैंड के मंत्री की यह यात्रा 16 मार्च, 2021 को एक शिखर बैठक के दौरान भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और फिनलैंड की समकक्ष सना मारिन की ओर से की गई घोषणा के तहत हुई है।

    डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय एसटीआई सहयोग अभिनव अनुसंधान और विकास परियोजनाओं को प्रोत्साहित करने का एक प्रयास है, जो एक विशिष्ट जरूरत या चुनौती, उच्च औद्योगिक प्रासंगिकता व व्यावसायिक क्षमता का प्रदर्शन और सभी प्रतिभागियों व इससे अधिक व्यापक रूप से दोनों राष्ट्रों को लाभ पहुंचाने के लक्ष्य को संबोधित करते हैं।

    डॉ. जितेंद्र सिंह ने इसका उल्लेख किया कि 18 अप्रैल 2022 को फिनलैंड के आर्थिक मामलों के मंत्री मीका लिंटिला की यात्रा के दौरान संयुक्त घोषणा पर हस्ताक्षर किए गए थे। इसके बाद दोनों पक्षों ने क्वांटम प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में सहयोग शुरू किया। क्वांटम कंप्यूटर के संयुक्त विकास पर फिनलैंड के संस्थानों के साथ काम करने के लिए भारतीय पक्ष ने पहले ही चार प्रमुख संस्थानों- पुणे स्थित आईआईएसईआर, आईआईटी- मद्रास, मुंबई के टीआईएफआर और पुणे स्थित सी-डैक को चिह्नित कर लिया है। डॉ. सिंह ने इस पर अपनी संतुष्टि व्यक्त की कि दोनों पक्षों के विशेषज्ञ क्वांटम कंप्यूटिंग पर भारत-फिनलैंड वर्चुअल नेटवर्क केंद्र की स्थापना के लिए विस्तृत योजना पर काम कर रहे हैं। इसके तहत पहले चरण में 20 क्यूबिट सुपरकंडक्टिंग आधारित क्वांटम कंप्यूटर विकसित करने और दूसरे चरण में इसे 54 क्यूबिट तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है।

    डॉ. जितेंद्र सिंह ने फिनलैंड के मंत्री को इसकी जानकारी दी कि भारत, फिनलैंड के अनुसंधान और विकास संस्थानों के साथ शोध सहभागिता विकसित करने व फिनलैंड के उद्योग, जो विशेष रूप से क्षेत्रों में क्वांटम कंप्यूटिंग के अनुप्रयोग पर ध्यान केंद्रित कर रहा है, के साथ प्रौद्योगिकी सहयोग विकसित करने का इच्छुक है। इनमें सतत ऊर्जा प्रौद्योगिकियां (उत्पादन, रूपांतरण, भंडारण और संरक्षण), पर्यावरण व स्वच्छ प्रौद्योगिकी, जैव आधारित अर्थव्यवस्था, जल और समुद्री प्रौद्योगिकियों के विभिन्न अनुप्रयोगों के लिए जैव बैंक व जैव आधारित सामग्री, खाद्य व कृषि प्रौद्योगिकी, वहनीय स्वास्थ्य सुविधाएं (औषधि और बायो-मेडिकल उपकरण सहित) और सभी क्षेत्रों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और मशीन शिक्षण के उन्नत विनिर्माण एकीकरण के लिए प्रौद्योगिकियां शामिल हैं।
    होंकोनेन ने डॉ जितेंद्र सिंह को इसका आश्वासन दिया कि फिनलैंड, भारत के साथ 5जी, पर्यावरण व स्वच्छ प्रौद्योगिकी, जैव-आधारित अर्थव्यवस्था, जैव बैंक और वहनीय स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में सहयोग करने को लेकर इच्छुक है। उन्होंने बताया कि दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों ने जिन विषयों को चिह्नित किया था, उन पर भी प्रगति हुई है।

    विज्ञान, प्रौद्योगिकी व नवाचार में भारत और फिनलैंड के बीच मजबूत आपसी संबंध है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी समझौते के ढांचे के तहत भारत सरकार के विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग व जैव प्रौद्योगिकी विभाग और बिजनेस फिनलैंड व एकेडमी ऑफ फिनलैंड के साथ फिनलैंड के आर्थिक कार्य व रोजगार मंत्रालय ने एक दशक से अधिक समय से सफलतापूर्वक सहयोग किया है।

  • लोकमंथन (23) लोक परम्पराओं में पर्यावरण और जल संरक्षण

    लोकमंथन (23) लोक परम्पराओं में पर्यावरण और जल संरक्षण

    पार्थसारथि थपलियाल।
    (गोहाटी लोकमंथन 21 से 24 सितंबर)
    24 सितंबर 2022 को एक महत्वपूर्ण सत्र भारतीय लोक परम्पराओं में पर्यावरण और जल संरक्षण पर केंद्रित था। जल सृष्टि के पंच महाभूत तत्वों में से एक है। वैसे तो धरती का 70 प्रतिशत भाग जल से ही भरा है लेकिन यह पीने योग्य नही है। जिस तरह से वैश्विक तापमान (Global warming) बढ़ रहा है उससे यह लगता है कि ध्रुवों पर जो ग्लेसियर हैं उनके पिघलने से पर्यावरणीय संकट और पेय जल संकट उपस्थित होगा। इस विषय पर चिंतन मनन और मंथन के लिए इस सत्र के संभागी थे- श्री चन्द्रशेखर सिंह, श्री हर्ष चौहान और सच्चिदानंद भारती।

    श्री चंद्रशेखर सिंह कृषि में नए प्रयोग के माध्यम से पैदावार बढ़ाने वाले प्रगतिशील कृषक हैं। कृषि का आधुनिकीकरण करना और उससे अन्य कृषकों को जोड़ने की प्रवृति ने उन्हें पद्मश्री पुरस्कार का हकदार बनाया। लोकमंथन 2022 में उन्हें दत्त चित्त से सुनना उनके अनुभव को सम्मान देना था।

    पर्यावरण और जल संरक्षण को लेकर उनकी चिंता समझी जा सकती थी। उन्होंने कहा जनसंख्या वृद्धि और आधुनिक जीवनशैली में आये परिवर्तन ने अनेक समस्याओं को जन्म दिया है। मांग और आपूर्ति तथा बाजारवाद ने न्याये उपभोक्ताव को जन्म दिया है। धरती का तापमान निरंतर बढ़ रहा है। वैज्ञानिकों की मान्यता है कि सन 2050 तक धरती का तापमान 4-5 डिग्री तक बढ़ जाएगा। घरों में आधुनिक उपकरण, वाहन और शौक के कारण पानी की खपत बढ़ गई है। कृषि पैदावार बढ़ाने के लिए सिंचित क्षेत्र जिस तरह बढ़ता गया, लोगों ने बोरवेल के माध्यम से धरती के अंदर का पानी निकाल कर ज़मीन को शुष्क बना दिया है। हमें खेती के तौर तरीकों में बदलाव लाने की आवश्यकता है। ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि एक किलो धान की पैदावार पैदा करने के लिए 3000 लीटर पानी की आवश्यकता पड़ती है। इसके लिए आवश्यक है कि कृषि में नई तकनीक अपनाई जाय जिससे कम से कम पानी से अधिक पैदावार प्राप्त की जा सके।

    अब से 30-40 साल पहले हम पाते थे कि 130-150 साल पुराने पेड़ भी हरे भरे और छायादार होते थे। आजकल पेड़ों की उम्र 30-40 साल होने लगी है। अनुसंधान करने पर पता चला कि पेड़ों की जड़ों को पर्याप्त पानी नही मिल रहा। पानी मिले भी तो कहां से? हमनें ज़मीन को बोरवेल खोद खोद कर सूखा कर दिया। ज़मीन का पानी 500-600 फीट गहरा चला गया। धरती छलनी की तरह हो गई। यही नही ज्यादा पैदावार लेने के लिए हमनें खेतों में जिस तरह रासायनिक खादों का उपयोग किया उससे कालांतर में खेतों की उर्वरा शक्ति कमजोर हो गई।

    गॉवों में तालाब/कुएं होते थे। उनका रख रखाव ठीक ढंग से न होने के कारण वर्षभर चलने वाला पानी नवंबर दिसंबर तक ही खत्म होने लगा। अत्यधिक औद्योगीकरण होने से कई तरह के घातक रासायनिक नदी नालों से कुओं में मिल जाने से कुएं बेकार हो गये। इस कारण आस पास के खेत भी बर्बाद हो गए। जो खेत रासायनिकों से दुष्प्रभावित हो गए उनसे पैदा होने वाली सब्जियां य्या अन्य अनाज बीमारी के कारण हो गए हैं। प्रदूषित पानी तालाबों अथवा नदियों में मिल जाने से मछली और अन्य जलीय जंतुओं का जीना मुश्किल हो गया है।

    सार्वजनिक स्थानों में छायादार या फलदार पेड़ पनपने की परंपरा खत्म हो रही है। अब लोग सरकार पर निर्भर हो गए हैं। जब तक समाज को वैदिक परंपरा से जीने का तरीका न समझाया जाय तब तक पर्यावरण को बचाना कठिन है। आम, पीपल, नीम, बरगद आदि पेड़ों की पूजा जो पहले होती थी उज़के महत्व को कोई समझना नही चाहता। इन्ही पेड़ों से हमें प्राणवायु मिलती है, उस परंपरा को जीवित रखे बिना जीवन का दीर्घायु होना कठिन है। हम पर्यावरण और जल संरक्षण का महत्व समझें।

  • सीबीजी संयंत्र किसानों तथा पर्यावरण के लिए समग्र रूप से लाभकारी स्थिति में आने की दिशा में एक लंबी छलांग है- हरदीप एस पुरी

    सीबीजी संयंत्र किसानों तथा पर्यावरण के लिए समग्र रूप से लाभकारी स्थिति में आने की दिशा में एक लंबी छलांग है- हरदीप एस पुरी

    समग्र समाचार सेवा
    नई दिल्ली, 19अक्टूबर। पंजाब के संगरुर के लेहरागागा में एशिया के सबसे बड़े कंप्रेस्ड बायो गैस संयंत्र का उद्घाटन के सबसे बड़े कंप्रेस्ड बायो गैस (सीबीजी) संयंत्र के उद्घाटन समारोह को संबोधित करते हुए, केंद्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस तथा आवासन एवं शहरी कार्य मंत्री हरदीप एस. पुरी ने कहा कि संगरुर का यह संयंत्र सीबीजी आधारित ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए भारत के मास्टर प्लान की केवल शुरुआत भर है। उन्होंने कहा कि सीबीजी समय की मांग है और सरकार इसके इर्द-गिर्द के इकोसिस्टम को बढ़ावा देने के लिए हरसंभव कदम उठा रही है।

    हरदीप एस. पुरी ने मंगलवार को संगरुर में एशिया के सबसे बड़े कंप्रेस्ड बायो गैस संयंत्र का उद्घाटन किया। इस संयंत्र को जर्मनी की अग्रणी बायो एनर्जी कंपनियों में से एक वर्बियो एजी द्वारा 220 करोड़ रुपये (लगभग) के एफडीआई निवेश के साथ कमीशन किया गया है। पंजाब के मुख्यमंत्री श्री भगवंत मान तथा वर्बियो इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के वरिष्ठ प्रबंधन अधिकारी कार्यक्रम के अवसर पर उपस्थित थे।

    हरदीप एस. पुरी द्वारा संगरुर में कंप्रेस्ड बायो गैस (सीबीजी) संयंत्र का उद्घाटन निम्न लागत परिवहन की दिशा में टिकाऊ वैकल्पिक (एसएटीएटी) स्कीम, जिसे भारत सरकार द्वारा अक्टूबर, 2018 में देशभर में विभिन्न अपशिष्ट/बायोमास स्रोतों से कंप्रेस्ड बायो गैस (सीबीजी) के उत्पादन के लिए एक परितंत्र स्थापित करने के लिए लांच किया गया था, के लक्ष्यों को अर्जित की ओर एक कदम है। इस स्कीम का उद्देश्‍य किसानों की सहायता करने के द्वारा ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त तथा मुक्त बनाना, भारत के घरेलू ऊर्जा उत्पादन और आत्मनिर्भरता को बढ़ाना तथा वायु प्रदूषण में कमी लाना तथा विश्व में एक स्वच्छ ऊर्जा परिगमन की दिशा में भारत का नेतृत्व करना शामिल है। इस संयंत्र के अतिरिक्त, एसएटीएटी पहल के तहत 38 सीबीजी / बायो गैस संयंत्रों को कमीशन किया गया है।

    संगरुर स्थित सीबीजी संयंत्र 20 एकड़ (लगभग) के क्षेत्र में फैला हुआ है। संयंत्र का वर्तमान उत्पादन लगभग 6 टीपीडी सीबीजी है लेकिन शीघ्र ही यह संयंत्र 10,000 क्यूबिक मीटर के 8 डाइजेस्टरों का उपयोग करने के जरिये 33 टीपीडी सीबीजी का उत्पादन करने की अधिकतम क्षमता के साथ 300 टन प्रति दिन धान की पुआल का प्रसंस्करण करेगा।

    सीबीजी संयंत्र के उद्घाटन के दिन के महत्व को नोट करते हुए हरदीप एस. पुरी ने कहा कि इस संयंत्र का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा कृषक समुदाय के लिए महत्वपूर्ण योजनाओं तथा लाभों की घोषणा किए जाने के बाद की गई है। कल प्रधानमंत्री ने पीएम-किसान प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण स्कीम की 12वीं किस्त जारी की। 16,000 करोड़ रुपये तत्काल किसानों-लाभार्थियों के खाते में हस्तांतरण कर दिए गए। पीएम-किसान स्कीम के तहत 12 लाख से अधिक किसान लाभार्थियों को कवर किया गया है। प्रधानमंत्री ने 600 प्रधानमंत्री किसान समृद्धि केंद्रों (पीएमकेएसके) का भी उद्घाटन किया जो न केवल उर्वरक के लिए विक्रय केंद्र होंगे बल्कि यह देश के किसानों के साथ एक प्रगाढ़ संबंध स्थापित करने के लिए एक तंत्र का काम भी करेगा। उन्होंने कल प्रधानमंत्री भारतीय जन उर्वरक परियोजना – एक राष्ट्र एक उर्वरक स्कीम भी लांच की जो ‘किसानों के लिए भारत ब्रांड’ के तहत किफायती गुणवत्तापूर्ण उर्वरक सुनिश्चितत करने की योजना है।

    केंद्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री ने कहा कि इस प्रकार के सीबीजी संयंत्रों की गई पहलें किसानों तथा पर्यावरण के लिए समग्र रूप से लाभकारी स्थिति में आने की दिशा में एक लंबी छलांग है।

    ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए संगरुर सीबीजी संयंत्र के लाभों की चर्चा करते हुए, श्री पुरी ने कहा कि यह संयंत्र 100,000 टन धान के भूसे की खपत करेगा जिसकी खरीद संयंत्र के 10 किलोमीटर के दायरे के भीतर 6-8 उपग्रह स्थलों से की जाएगी। प्रति दिन लगभग 600-650 टन एफओएम (फर्मेंटेड जैविक खाद) का उत्पादन होगा जिसका उपयोग जैविक खेती के लिए किया जा सकता है। सीबीजी संयंत्र प्रत्यक्ष रूप से 390 लोगों को तथा अप्रत्यक्ष रूप से 585 लोगों को रोजगार भी उपलब्ध कराएगा।

    पुरी ने यह भी कहा कि इस संयंत्र से न केवल संगरुर के किसानों के लिए अतिरिक्त आय की प्राप्ति होगी बल्कि यह पराली जलाये जाने का एक बहुत आवश्यक विकल्प भी उपलब्ध कराएगा। उन्होंने बताया कि संगरुर सीबीजी संयंत्र 40,000 – 45,000 एकड़ खेतों में पराली जलाने में कमी लाएगा जिससे वार्षिक रूप से 150,000 टन कार्बन डाईऑक्साइड उत्सर्जन में गिरावट आएगी जो न केवल पंजाब के संगरुर के नागरिकों को स्वच्छ वायु में सांस लेने में मदद करेगा बल्कि 2070 तक निवल शून्य उत्सर्जन के लक्ष्य को अर्जित करने के लिए अभी से 2030 तक एक बिलियन टन द्वारा कुल अनुमानित कार्बन डायऑक्साइड उत्सर्जन के भारत के सीओपी 26 जलवायु परिवर्तन उद्देश्‍यों की दिशा में भी योगदान देगा।

    कैस्केड्स, कंप्रेशर्स तथा डिस्पेंसर्स जैसे सीबीजी संयंत्र उत्पादन के स्वदेशी विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए किए जा रहे प्रयासों का उल्लेख करते हुए हरदीप एस. पुरी ने कहा कि इससे भारत भर के विनिर्माण क्षेत्र में ‘मेक इन इडिया’ अवसरों में बढ़ोतरी होगी। उन्होंने कहा कि हम संयंत्रों की स्थापना के लिए सस्ता ऋण उपलब्ध कराने के लिए हितधारकों के साथ काम कर रहे हैं।

  • भारत गंभीर ऋण, खाद्य, ऊर्जा सुरक्षा और पर्यावरण के मुद्दों के समाधान के लिए जी20 सदस्यों के साथ काम करेगा: विदेश मंत्री जयशंकर

    भारत गंभीर ऋण, खाद्य, ऊर्जा सुरक्षा और पर्यावरण के मुद्दों के समाधान के लिए जी20 सदस्यों के साथ काम करेगा: विदेश मंत्री जयशंकर

    समग्र समाचार सेवा
    संयुक्त राष्ट्र, 26 सितंबर। भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा कि नई दिल्ली प्रभावशाली समूह के अन्य सदस्यों के साथ ऋण, खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा और पर्यावरण जैसे गंभीर मुद्दों को हल करने के लिए काम करेगी।

    G20 दुनिया के सबसे बड़े औद्योगिक और विकासशील देशों का एक अंतर-सरकारी समूह है। G20 की अध्यक्षता 1 दिसंबर, 2022 से 30 नवंबर, 2023 तक भारत करेगा।

    दिसंबर 2022 से शुरू होकर, भारत की अध्यक्षता में देश भर में 200 से अधिक G20 बैठकों की मेजबानी करने की उम्मीद है। राष्ट्राध्यक्षों/शासनाध्यक्षों के स्तर पर G20 नेताओं का शिखर सम्मेलन 9-10 सितंबर, 2023 को नई दिल्ली में निर्धारित है।

    जयशंकर ने शनिवार को यहां संयुक्त राष्ट्र महासभा के उच्च स्तरीय सत्र को संबोधित करते हुए कहा, “चूंकि हम इस दिसंबर में जी20 की अध्यक्षता शुरू कर रहे हैं, हम विकासशील देशों के सामने आने वाली चुनौतियों के प्रति संवेदनशील हैं।”

    उन्होंने 193 सदस्यीय संयुक्त राष्ट्र महासभा को बताया कि भारत अन्य जी20 सदस्यों के साथ कर्ज, आर्थिक विकास, खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा और विशेष रूप से पर्यावरण के गंभीर मुद्दों के समाधान के लिए काम करेगा।

    उन्होंने कहा, “बहुपक्षीय वित्तीय संस्थानों के शासन में सुधार हमारी मुख्य प्राथमिकताओं में से एक रहेगा।”

    उन्होंने यह भी कहा कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भी इसकी स्थिरता और सुरक्षा को लेकर नई चिंताएं हैं। रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्र में चीन की आक्रामक कार्रवाई के बीच उनका यह बयान आया है।

    यह देखते हुए कि जबकि वैश्विक ध्यान यूक्रेन पर रहा है, भारत को अन्य चुनौतियों का भी सामना करना पड़ा है, विशेष रूप से अपने पड़ोस में, पूर्वी लद्दाख में चीन के साथ अनसुलझे गतिरोध और पाकिस्तान के साथ तनावपूर्ण संबंधों के एक स्पष्ट संदर्भ में।

    उन्होंने कहा कि उनमें से कुछ कोविड महामारी और चल रहे संघर्षों से बढ़ सकते हैं, लेकिन वे एक गहरी अस्वस्थता की बात करते हैं। नाजुक अर्थव्यवस्थाओं में ऋण का संचय विशेष चिंता का विषय है।

    उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत का मानना ​​है कि ऐसे समय में अंतरराष्ट्रीय समुदाय को संकीर्ण राष्ट्रीय एजेंडा से ऊपर उठना चाहिए। भारत, अपने हिस्से के लिए, असाधारण समय में असाधारण उपाय कर रहा है “जब हम राजनीतिक जटिलता से अप्रभावित मानवीय जरूरतों में अंतर को भरते हैं।”

    उन्होंने इस बात पर प्रकाश डाला कि भारत ने अफगानिस्तान को 50,000 मीट्रिक टन गेहूं और दवाओं और टीकों की कई किश्तें भेजीं, ईंधन, आवश्यक वस्तुओं और व्यापार समझौते के लिए श्रीलंका को 3.8 बिलियन डॉलर का ऋण दिया, 10,000 मीट्रिक टन खाद्य सहायता और वैक्सीन शिपमेंट की आपूर्ति की।

    उन्होंने कहा, “चाहे आपदा प्रतिक्रिया हो या मानवीय सहायता, भारत मजबूत खड़ा रहा है, विशेष रूप से अपने निकटतम लोगों के लिए योगदान दे रहा है।

    G20 में 19 देश (अर्जेंटीना, ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील, कनाडा, चीन, फ्रांस, जर्मनी, भारत, इंडोनेशिया, इटली, जापान, कोरिया गणराज्य, मैक्सिको, रूस, सऊदी अरब, दक्षिण अफ्रीका, तुर्की, यूके, यूएसए) शामिल हैं।

    सामूहिक रूप से, G20 वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद का 85 प्रतिशत, अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का 75 प्रतिशत और विश्व जनसंख्या का दो-तिहाई हिस्सा है, जो इसे अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक सहयोग का प्रमुख मंच बनाता है।

    भारत वर्तमान में G20 Troika (वर्तमान, पिछली और आने वाली G20 प्रेसीडेंसी) का हिस्सा है जिसमें इंडोनेशिया, इटली और भारत शामिल हैं।

    विदेश मंत्रालय ने एक प्रेस में कहा, “हमारे प्रेसीडेंसी के दौरान, भारत, इंडोनेशिया और ब्राजील ट्रोइका बनाएंगे। यह पहली बार होगा जब ट्रोइका में तीन विकासशील देश और उभरती अर्थव्यवस्थाएं शामिल होंगी, जो उन्हें एक बड़ी आवाज प्रदान करेगी।”

  •  “जब पर्यावरण मंत्रालयों का नजरिया बदलेगा तो मुझे यकीन है कि प्रकृति को भी फायदा होगा”- पीएम मोदी

     “जब पर्यावरण मंत्रालयों का नजरिया बदलेगा तो मुझे यकीन है कि प्रकृति को भी फायदा होगा”- पीएम मोदी

    समग्र समाचार सेवा
    अहमदाबाद, 24सितंबर। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शुक्रवार को वीडियो कॉन्फ्रेंस के माध्यम से गुजरात के एकता नगर में पर्यावरण मंत्रियों के राष्ट्रीय सम्मेलन का शुभारंभ किया।

    सभा को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने एकता नगर में आयोजित पर्यावरण मंत्रियों के राष्ट्रीय सम्मेलन में सभी का स्वागत किया। प्रधानमंत्री ने इस बात पर प्रकाश डाला कि सम्मेलन तब हो रहा है जब भारत अगले 25 वर्षों के लिए नए लक्ष्य निर्धारित कर रहा है। इसका महत्व बताते हुए, प्रधानमंत्री ने कहा कि वनों, जल संरक्षण, पर्यटन और हमारे आदिवासी भाइयों व बहनों की बात करें तो एकता नगर का समग्र विकास पर्यावरण के तीर्थ क्षेत्र का एक प्रमुख उदाहरण है।

    इंटरनेशनल सोलर एलाइंस, कोएलिशन फॉर डिजास्टर रेसिलियंट इन्फ्राट्रक्चर, और लाइफ अभियान का उदाहरण देते हुए, प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत न केवल अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र में बड़ी प्रगति कर रहा है, बल्कि दुनिया के अन्य देशों का भी मार्गदर्शन कर रहा है। प्रधानमंत्री ने कहा, “आज का नया भारत, नई सोच, नई अप्रोच के साथ आगे बढ़ रहा है।” प्रधानमंत्री ने कहा कि आज भारत तेजी से विकसित होती इकोनॉमी भी है, और निरंतर अपनी इकोलॉजी को भी मजबूत कर रहा है। उन्होंने कहा, “हमारे वन कवर में वृद्धि हुई है और आर्द्रभूमि का दायरा भी तेजी से बढ़ रहा है।”

    प्रधानमंत्री ने कहा कि अपनी प्रतिबद्धता को पूरा करने के हमारे ट्रैक रिकॉर्ड के कारण ही दुनिया आज भारत के साथ जुड़ रही है। प्रधानमंत्री ने कहा, “बीते वर्षों में गीर के शेरों, बाघों, हाथियों, एक सींग के गेंडों और तेंदुओं की संख्या में वृद्धि हुई है। कुछ दिन पहले मध्य प्रदेश में चीता की घर वापसी से एक नया उत्साह लौटा है।”

    प्रधानमंत्री ने वर्ष 2070 के नेट जीरो लक्ष्य की ओर सबका ध्यान आकर्षित करते हुए कहा कि भारत ने साल 2070 तक नेट जीरो का लक्ष्य रखा है। अब देश का फोकस ग्रीन ग्रोथ पर है, ग्रीन जॉब्स पर है। उन्होंने कहा कि इन सभी लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए, हर राज्य के पर्यावरण मंत्रालय की भूमिका बहुत बड़ी है। प्रधानमंत्री ने कहा, “मैं सभी पर्यावरण मंत्रियों से आग्रह करूंगा कि राज्यों में सर्कुलर इकोनॉमी को ज्यादा से ज्यादा बढ़ावा दें।” श्री मोदी ने कहा कि इससे सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट और एकल उपयोग वाली प्लास्टिक से मुक्ति के हमारे अभियान को भी ताकत मिलेगी।

    पर्यावरण मंत्रालयों की भूमिका को रेखांकित करते हुए, प्रधानमंत्री ने कहा कि इस भूमिका को सीमित तरीके से नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने इस बात पर अफसोस व्यक्त किया कि लंबे समय तक पर्यावरण मंत्रालय एक नियामक के रूप में ही अधिक देखा गया है। हालांकि, प्रधानमंत्री ने कहा, “मुझे लगता है कि पर्यावरण मंत्रालय की भूमिका नियामक के बजाय पर्यावरण को प्रोत्साहित करने के रूप में अधिक है।” उन्होंने राज्यों से वाहन स्क्रैपिंग नीति, और जैव ईंधन उपायों जैसे एथेनॉल मिश्रण आदि उपायों को जमीनी स्तर पर मजबूत करने के लिए कहा। उन्होंने इन उपायों को बढ़ावा देने के लिए स्वस्थ प्रतिस्पर्धा के साथ-साथ राज्यों के बीच सहयोग कायम करने का आह्वान किया।

    भूजल के मुद्दों पर प्रकाश डालते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि आजकल हम देखते हैं कि कभी जिन राज्यों में पानी की बहुलता थी, ग्राउंड वॉटर ऊपर रहता था, वहां आज पानी की किल्लत दिखती है। प्रधानमंत्री ने कहा कि रसायन मुक्त प्राकृतिक खेती, अमृत सरोवर और जल सुरक्षा जैसी चुनौतियां व उपाय सिर्फ पानी से जुड़े विभाग की ही नहीं है, बल्कि पर्यावरण विभाग को भी इसे उतनी ही बड़ी चुनौती समझना होगा। “पर्यावरण मंत्रालयों द्वारा एक सहभागी और एकीकृत दृष्टिकोण के साथ काम करना महत्वपूर्ण है। जब पर्यावरण मंत्रालयों का नजरिया बदलेगा तो मुझे यकीन है कि प्रकृति को भी फायदा होगा।”

    इस बात पर जोर देते हुए कि यह काम सिर्फ सूचना विभाग या शिक्षा विभाग तक सीमित नहीं है, प्रधानमंत्री ने कहा कि पर्यावरण की रक्षा के लिए जन जागरूकता एक और महत्वपूर्ण पहलू है। श्री मोदी ने कहा, “जैसा कि आप सभी अच्छी तरह से जानते हैं कि देश में लागू की गई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में अनुभव आधारित शिक्षा पर बहुत जोर दिया गया है।” प्रधानमंत्री ने कहा कि इस अभियान का नेतृत्व पर्यावरण मंत्रालय को करना चाहिए। इससे बच्चों में जैव विविधता के प्रति जागरूकता पैदा होगी और पर्यावरण की रक्षा के बीज भी बोए जाएंगे। प्रधानमंत्री ने कहा, “हमारे तटीय क्षेत्रों में रहने वाले बच्चों को यह भी सिखाया जाना चाहिए कि मरीन इको-सिस्टम की रक्षा कैसे करें। हमें अपने बच्चों और आने वाली पीढ़ियों को पर्यावरण के प्रति संवेदनशील बनाना है।” हमारे राज्यों के विश्वविद्यालयों और प्रयोगशालाओं को जय अनुसंधान के मंत्र का पालन करते हुए पर्यावरण संरक्षण से संबंधित नवाचारों को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिए। प्रधानमंत्री ने पर्यावरण की रक्षा के लिए प्रौद्योगिकी को अपनाने पर भी जोर दिया। श्री मोदी ने कहा, “जंगलों में वनों की स्थिति पर अध्ययन और अनुसंधान समान रूप से महत्वपूर्ण हैं।”

    पश्चिमी दुनिया में जंगल की आग की चिंताजनक दर पर ध्यान केंद्रित करते हुए, प्रधानमंत्री ने कहा कि वाइल्ड-फायर की वजह से वैश्विक उत्सर्जन में भारत की हिस्सेदारी भले ही नगण्य हो, लेकिन हमें अभी से जागरूक होना होगा। प्रधानमंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि हर राज्य में फायर फाइटिंग मैकेनिज्म मजबूत हो, टेक्नोलॉजी आधारित हो, ये बहुत जरूरी है। श्री मोदी ने हमारे वन रक्षकों के प्रशिक्षण पर भी जोर दिया, जब जंगल में आग बुझाने की बात हो तो विशेष जोर दिया जाना चाहिए।

    एनवायरमेंट क्लीयरेंस प्राप्त करने में आने वाली जटिलताओं की ओर इशारा करते हुए, प्रधानमंत्री ने कहा कि आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर के बिना, देश का विकास, देशवासियों के जीवन स्तर को सुधारने का प्रयास सफल नहीं हो सकता।

    प्रधानमंत्री ने सरदार सरोवर बांध का उदाहरण दिया जिसे 1961 में पंडित नेहरू द्वारा शुरू किया गया था। उन्होंने कहा कि पर्यावरण के नाम पर की जा रही साजिशों के कारण इसके निर्माण को पूरा करने में दशकों लग गए। प्रधानमंत्री ने विभिन्न वैश्विक संगठनों और फाउंडेशनों से करोड़ों रुपये लेकर भारत के विकास में बाधा डालने में शहरी नक्सलियों की भूमिका को भी चिन्हित किया। प्रधानमंत्री ने ऐसे लोगों की साजिशों की ओर भी इशारा किया जिसके चलते विश्व बैंक ने बांध की ऊंचाई बढ़ाने के लिए कर्ज देने से इनकार कर दिया था। प्रधानमंत्री ने कहा, “इन साजिशों को विफल करने में कुछ समय लगा, लेकिन गुजरात के लोग विजयी हुए। बांध को पर्यावरण के लिए खतरा बताया जा रहा था और आज वही बांध पर्यावरण की रक्षा का पर्याय बन गया है।” प्रधानमंत्री ने सभी से अपने-अपने राज्यों में शहरी नक्सलियों के ऐसे समूहों से सतर्क रहने का भी आग्रह किया। प्रधानमंत्री ने दोहराते हुए कहा कि एनवायरमेंट क्लीयरेंस के लिए 6000 से अधिक प्रस्ताव और फॉरेस्ट क्लीयरेंस के लिए 6500 आवेदन राज्यों के पास पड़े हैं। उन्होंने कहा, “राज्यों द्वारा हर उपयुक्त प्रस्ताव को जल्द से जल्द मंजूरी देने का प्रयास किया जाना चाहिए। आप अंदाजा लगा सकते हैं कि इस देरी की वजह से हजारों करोड़ रुपये के प्रोजेक्ट अटक जाएंगे।” प्रधानमंत्री ने काम के माहौल में बदलाव लाने की जरूरत पर भी जोर दिया ताकि लंबित मामलों की संख्या कम हो और मंजूरी में तेजी लाई जा सके। प्रधानमंत्री ने कहा कि एनवायरमेंट क्लीयरेंस देने में हम नियमों का भी ध्यान रखते हैं और उस क्षेत्र के लोगों के विकास को भी प्राथमिकता देते हैं। उन्होंने कहा, “यह इकोनॉमी और इकोलॉजी दोनों के लिए एक जीत की स्थिति है।” उन्होंने जोर देकर कहा, “हमारी कोशिश होनी चाहिए कि पर्यावरण के नाम पर ईज ऑफ लिविंग और ईज ऑफ डूइंग बिजनेस के कार्य में कोई बाधा पैदा न होने दी जाए। हमें यह याद रखना होगा कि जितनी तेजी से एनवायरमेंट क्लीयरेंस मिलेगी, विकास भी उतनी ही तेजी से होगा।

    प्रधानमंत्री ने दिल्ली में प्रगति मैदान सुरंग का उदाहरण दिया जिसे कुछ सप्ताह पहले राष्ट्र को समर्पित किया गया। “इस सुरंग के कारण दिल्ली के लोगों के जाम में फंसने की परेशानी कम हुई है। प्रगति मैदान सुरंग हर साल 55 लाख लीटर से अधिक ईंधन बचाने में भी मदद करेगी। इससे हर साल कार्बन उत्सर्जन में करीब 13 हजार टन की कमी आएगी जो कि 6 लाख से ज्यादा पेड़ों के बराबर है। श्री मोदी ने कहा, “चाहे फ्लाईओवर, सड़कें, एक्सप्रेसवे या रेलवे परियोजनाएं हों, उनके निर्माण से कार्बन उत्सर्जन को कम करने में समान रूप से मदद मिलती है। क्लीयरेंस के समय हमें इस बिंदु की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए।”

    प्रधानमंत्री ने पर्यावरण से संबंधित सभी प्रकार की मंजूरी के लिए सिंगल विंडो मोड परिवेश पोर्टल के इस्तेमाल पर जोर देते हुए कहा कि परिवेश पोर्टल, पर्यावरण से जुड़े सभी तरह के क्लीयरेंस के लिए सिंगल-विंडो माध्यम बना है। ये ट्रांसपेरेंट भी है और इससे अप्रूवल के लिए होने वाली भागदौड़ भी कम हो रही है। प्रधानमंत्री ने कहा, “आठ साल पहले तक एनवायरमेंट क्लीयरेंस में जहां 600 से ज्यादा दिन लग जाते थे, वहीं आज 75 दिन लगते हैं।”

    प्रधानमंत्री ने कहा कि इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट में समन्वय बढ़ा है, जबकि कई परियोजनाओं ने गति शक्ति राष्ट्रीय मास्टर प्लान के कार्यान्वयन के बाद से गति प्राप्त की है। पर्यावरण की रक्षा के लिए पीएम गति शक्ति राष्ट्रीय मास्टर प्लान भी एक बेहतरीन उपाय है। उन्होंने आपदा-रोधी इंफ्रास्ट्रक्चर की आवश्यकता पर भी जोर दिया। श्री मोदी ने कहा कि हमें जलवायु परिवर्तन से जुड़ी चुनौतियों का सामना करते हुए अर्थव्यवस्था के हर उभरते हुए क्षेत्र का सदुपयोग करना है। प्रधानमंत्री ने कहा, “केंद्र और राज्य सरकार दोनों को मिलकर ग्रीन इंडस्ट्रियल इकोनॉमी की ओर बढ़ना है।”

    अपने संबोधन के समापन में प्रधानमंत्री ने कहा कि पर्यावरण मंत्रालय न केवल एक नियामक संस्था है, बल्कि लोगों के आर्थिक सशक्तिकरण और रोजगार के नए साधन पैदा करने का एक बड़ा माध्यम भी है। “आपको एकता नगर में सीखने, देखने और करने के लिए बहुत कुछ मिलेगा। गुजरात के करोड़ों लोगों को अमृत देने वाला सरदार सरोवर बांध यहीं मौजूद है।’

    केवड़िया, एकता नगर में सीखने के अवसरों की ओर इशारा करते हुए, प्रधानमंत्री ने कहा कि इकोलॉजी और इकोनॉमी के एक साथ विकास, पर्यावरण को मजबूत करने एवं रोजगार के नए अवसरों के निर्माण, इको-टूरिज्म को बढ़ाने के माध्यम के रूप में जैव विविधता, और हमारे आदिवासी भाइयों और बहनों की संपत्ति के साथ वन संपदा के विकास जैसे मुद्दों का समाधान यहां से किया जा सकता है।

    इस अवसर पर गुजरात के मुख्यमंत्री श्री भूपेन्द्र पटेल और केन्द्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री श्री भूपेन्द्र यादव उपस्थित थे।

    पृष्ठभूमि

    सहकारी संघवाद की भावना को आगे बढ़ाते हुए, बहु-आयामी दृष्टिकोण के माध्यम से प्लास्टिक प्रदूषण मैं कमी लाने, जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए राज्यों की कार्ययोजनाओं, जीवन-शैली पर प्रभावी ढंग से ध्यान केंद्रित करने, पर्यावरण के लिए जीवन शैली जैसे मुद्दों पर बेहतर नीतियां तैयार करने में केंद्र व राज्य सरकारों के बीच और तालमेल बनाने के लिए सम्मेलन आयोजित किया जा रहा है। यह वन क्षेत्र को बढ़ाने पर भी ध्यान केंद्रित करेगा, जिसमें विशेष रूप से डीग्रेडेड भूमि को दुरुस्त करने और वन्यजीव संरक्षण पर जोर दिया जाएगा।

    23 और 24 सितंबर को आयोजित किए जा रहे दो-दिवसीय सम्मेलन में छह विषयगत सत्र होंगे, जिनमें लाइफ, जलवायु परिवर्तन का मुकाबला (उत्सर्जन के शमन और जलवायु प्रभावों के अनुकूलन के लिए जलवायु परिवर्तन पर राज्यों की कार्ययोजनाओं को अद्यतन करना), परिवेश (एकीकृत हरित मंजूरी सिंगल विंडो सिस्टम); वानिकी प्रबंधन; प्रदूषण की रोकथाम और नियंत्रण; वन्यजीव प्रबंधन; प्लास्टिक और अपशिष्ट प्रबंधन पर ध्यान केंद्रित करने वाले विषय शामिल होंगे।

  • डॉ. जितेंद्र सिंह ने स्वास्थ्य, ऊर्जा, पर्यावरण, डिजिटलीकरण और स्वचालन के विषयों पर काम करने वाले चयनित 30 स्टार्टअप संस्थापकों के साथ एक लघु प्रदर्शनी का किया उद्घाटन

    डॉ. जितेंद्र सिंह ने स्वास्थ्य, ऊर्जा, पर्यावरण, डिजिटलीकरण और स्वचालन के विषयों पर काम करने वाले चयनित 30 स्टार्टअप संस्थापकों के साथ एक लघु प्रदर्शनी का किया उद्घाटन

    समग्र समाचार सेवा
    नई दिल्ली, 21अगस्त। केंद्रीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री एवं पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार), प्रधानमंत्री कार्यालय, कार्मिक, लोक शिकायत, पेंशन, परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने आज पुणे स्थित वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) के नए भवन परिसर का उद्घाटन किया और स्टार्टअप्स के साथ बातचीत की।

    वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद – सूचना उत्पाद अनुसंधान एवं विकास यूनिट (सीएसआईआर-यूआरडीआईपी) का नया संस्थागत भवन राष्ट्रीय रासायनिक प्रयोगशाला (एनसीएल) परिसर में स्थित है और इसके उद्घाटन के अवसर पर स्वास्थ्य, ऊर्जा, पर्यावरण, डिजिटलीकरण और स्वचालन के विषयों पर काम कर रहे चयनित 30 स्टार्टअप संस्थापकों के साथ एक लघु (मिनी) प्रदर्शनी का आयोजन किया गया था।

    डॉ. जितेंद्र सिंह ने दुनिया के पहले धुएं रहित सैनिटरी पैड निपटान और पुनर्चक्रण (रीसाइक्लिंग) प्रणाली वाले दुनिया के पहले दोहरे रूप में संचालित (ग्रिड + मैकेनिकल) द्विचरणीय (बाइफेजिक) डिफाइब्रिलेटर जैसे पहली तरह के नवाचारों के साथ आने वाले भारतीय स्टार्टअप में गहरी दिलचस्पी ली। मंत्री महोदय ने संस्थापकों को इस तरह के वैश्विक नवाचारों को बढ़ाने के उद्देश्य से उदार वित्त पोषण के लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग से संपर्क करने का आश्वासन दिया। उन्होंने उद्योगों से भारत के स्टार्टअप पर्यावरण (इकोसिस्टम) को अधिक जीवंत एवं परिणामोन्मुखी बनाने के लिए ऐसी सफलता की कहानियों के साथ साझेदारी करने की भी अपील की।

    डॉ. जितेंद्र सिंह ने परिसंचारी ट्यूमर कोशिका नैदानिक समाधान (सेल डायग्नोस्टिक समाधान) के लिए सीडीएससीओ द्वारा अनुमोदित भारत के पहले और एकमात्र जैव-सक्रिय ग्लास आधारित सिंथेटिक हड्डी-ग्राफ्ट विकल्प दंत उत्पाद, अगली पीढ़ी के बायोनिक हथियार, दृष्टि पोस्ट में सुधार के लिए अनुकूलन योग्य इंट्राओक्युलर लेंस मोतियाबिंद सर्जरी और अगली पीढ़ी की सोडियम आयन बैटरी प्रौद्योगिकियां विकसित करने के लिए विभिन्न कंपनियों की सराहना की ।

    कृषि स्टार्टअप्स में गहरी दिलचस्पी लेते हुए डॉ. जितेंद्र सिंह ने सिंचाई प्रबंधन को स्मार्ट, विश्वसनीय और कुशल परिणाम “प्रति क्षेत्र अधिक उपज”, और अगली पीढ़ी के कृषि जैविक फसलों को जलवायु को लचीला और कीड़ों एवं रोगों के लिए प्रतिरोधी बनाने के लिए भारत के पहले और सबसे बड़े संपीड़ित बायोगैस संयंत्र के मालिकों के साथ जैविक खाद्य अपशिष्ट को संपीड़ित बायो गैस में परिवर्तित करने के साथ-साथ स्वदेशी रूप से विकसित सेंसर तकनीक के लिए कंपनियों के साथ बातचीत की। उन्होंने बड़े पैमाने पर कृषि स्टार्टअप्स को हर संभव सहायता देने का वादा किया।

    कार्यक्रम के दौरान रीयल-टाइम आईओटी – आधारित वायु गुणवत्ता निगरानी उपकरण के साथ काम करने वाले स्टार्टअप्स के साथ ही यूनिकॉर्न अवस्था प्राप्त एक ऐसी कंपनी भी उपस्थित थी जिसने अगली पीढ़ी की 5जी वायरलेस तकनीक विकसित की है जो बिना लाइसेंस वाले स्पेक्ट्रम में बड़े पैमाने पर फाइबर-क्लास, नॉन-लाइन-ऑफ-विज़न ब्रॉडबैंड प्रदान करती है।

    इस अवसर पर पूरी तरह से स्वायत्त बुद्धिमान हाउसकीपिंग, सामग्री प्रबंधन, औद्योगिक और व्यावसायिक उपयोगों के लिए रोबोट सेवा देने वाली अपने तरह की पहली कम्पनी भी आई थी।

    नए भवन परिसर का उद्घाटन करने के बाद बातचीत से पहले डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद – सूचना उत्पाद अनुसंधान एवं विकास यूनिट (सीएसआईआर-यूआरडीआईपी) पेटेंट विश्लेषण (एनालिटिक्स) और सूचना विज्ञान गतिविधियों में संलग्न एक प्रसिद्ध राष्ट्रीय उत्कृष्टता केंद्र है। उन्होंने कहा कि सीएसआईआर की एक विशेष सेवा इकाई के रूप में, विशिष्ट ज्ञान-आधारित सेवा क्षेत्र को पूरा करने के लिए, सीएसआईआर-यूआरडीआईपी अपने अस्तित्व के 22 वें वर्ष में है, जो पूर्व-अनुसंधान और पूर्व-विकास चरणों का समर्थन करने वाली निरंतर विश्लेषिकी और सूचना विज्ञान सेवाओं की गतिविधियों के लिए समर्पित है। साथ ही नियमित, मिशन-मोड और थीम-आधारित सीएसआईआर अनुसंधान और विकास परियोजनाओं के अलावा अनुसंधान संस्थानों, स्टार्ट-अप, एसएमई, भारतीय कॉरपोरेट्स तथा बहुराष्ट्रीय निगमों को सहायता सेवाएं भी प्रदान करता है।

    डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि उन्हें यह जानकर प्रसन्नता हो रही है कि पिछले 2 दशकों में, वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद – सूचना उत्पाद अनुसंधान एवं विकास यूनिट (सीएसआईआर – यूआरडीआईपी) ने पेटिनफॉरमैटिक्स, केम बायो-इनफॉरमैटिक्स [औषधियों की खोज हेतु निवेश (इनपुट टू ड्रग डिस्कवरी – इंफॉर्मेशन प्रोडक्ट्स], फाइटो – इनफॉरमैटिक्स, टॉक्सिनफॉर्मेटिक्स और वेब-आधारित अनुप्रयोगों के विकास में अग्रणी पंक्ति की (फ्रंटलाइन) क्षमताओं के साथ ही पोर्टल, विषय-विशिष्ट डेटाबेस, ओपन एक्सेस और ओपन इनोवेशन का समर्थन करने के लिए संस्थागत रिपोजिटरी, विभिन्न हितधारकों को मूल्य वर्धित सूचना सेवाएं प्रदान करने और सीएसआईआर ज्ञान आधार के लिए सराहनीय मूल्यवर्धन के लिए काम किया है।

    अपने सम्बोधन के अंत में डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि अपने संस्थागत परिसर के विस्तार के साथ ही सीएसआईआर-यूआरडीआईपी के लिए आत्म निर्भर भारत को साकार करने की दिशा में इस प्रमुख सूचना विज्ञान क्षेत्र में अपनी विविध गतिविधियों के दायरे और कार्यक्षेत्र का विस्तार करने एवं देश भर में अधिक आंतरिक छात्रों और विदेशों के ग्राहकों और हितधारकों के अनुरोध की पूरा करने के अवसर बढ़े है तथा उसके अपने कौशल विकास कार्यक्रमों में अपने योगदान को और तेज करने की संभावनाएं भी बढ़ गई हैं।