विदेशी पूँजी और भारत की आर्थिक वृद्धि: टाइम सीरीज़ अनुमान – नीडोनॉमिक्स की आलोचना
पुस्तक समीक्षा:Foreign Capital and Economic Growth in India: Time Series Estimation लेखक: महेन्द्र पाल प्रकाशक: स्प्रिंगर नेचर, सिंगापुर (पैल्ग्रेव मैकमिलन, स्प्रिंगर नेचर, 2023) पृष्ठ: 185 | मूल्य: किराये के आधार पर उपलब्ध (नए और पुराने संस्करण) समीक्षक: प्रो. मदन मोहन गोयल, प्रणेता नीडोनॉमिक्स एवं पूर्व कुलपति (तीन बार) विदेशी पूँजी प्रवाह हमेशा से ही विकास विमर्श में विवादास्पद विषय रहा है। मुख्यधारा की अर्थशास्त्र प्रायः इन प्रवाहों की मात्रा का महिमामंडन करती है, जबकि नीडोनॉमिक्स स्कूल ऑफ थॉट (NST) यह चेतावनी देता है कि विकास को केवल पूँजी संचय की दौड़ तक सीमित नहीं किया जा सकता। नीडोनॉमिक्स के अनुसार वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या यह पूँजी समाज की ज़रूरतों को पूरा कर रही है या केवल लालच को बढ़ावा दे रही है। इस दृष्टिकोण से देखा जाए तो Foreign Capital and Economic Growth in India: Time Series Estimation पुस्तक समयानुकूल और विचारोत्तेजक है। यह भारत की विदेशी पूँजी–विकास संबंधी कड़ी पर ठोस अनुभवजन्य साक्ष्य प्रस्तुत करती है और साथ ही इस प्रवाह के नैतिक, समावेशी एवं टिकाऊ उपयोग पर गहन प्रश्न उठाती है। संदर्भगत महत्त्व पुस्तक भारत के अनुभव को वैश्विक पूँजी की अस्थिरता के संदर्भ में प्रस्तुत करती है। उदाहरणस्वरूप, 2008 में एफडीआई प्रवाह 3.4 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुँच गया था लेकिन 2023 तक घटकर 1.3 ट्रिलियन डॉलर रह गया। वहीं दूसरी ओर, प्रवासी भारतीयों द्वारा भेजी गई रक़म 656 बिलियन डॉलर तक पहुँच गई, जो विदेशी सहायता से अधिक थी। इन उतार-चढ़ावों के बावजूद भारत ने लगातार तीन दशकों तक 6.5 प्रतिशत की विकास दर बनाए रखी। नीडोनॉमिक्स की व्याख्या यह कहती है कि भले ही पूँजी प्रवाह ने व्यापक आर्थिक स्थिरता में योगदान दिया हो, किंतु असली प्रश्न यह है कि क्या यह प्रवाह रोज़गार, समान विकास और सामाजिक कल्याण जैसे ज़रूरत-आधारित परिणामों के लिए प्रयुक्त हुआ है, या केवल सट्टा बाज़ार और कॉर्पोरेट मुनाफ़े को मज़बूत करने में?...
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