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Tag: प्रो. मदन मोहन गोयल

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विश्व जनसंख्या दिवस 2025 पर जनसंख्या प्रबंधन पर पुनर्विचार

प्रो. मदन मोहन गोयल, नीडोनॉमिक्स के प्रवर्तक एवं पूर्व कुलपति विश्व जनसंख्या दिवस (11जलाई) के अवसर पर जनसंख्या वृद्धि, उसकी चुनौतियों, प्रभावों और नवाचारपूर्ण समाधानों पर पुनर्विचार का उपयुक्त समय आ गया है। वर्ष 2025 में विश्व की कुल वर्तमान जनसंख्या 8,191,988,453 है, जो 2024 की तुलना में 0.9%...

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दुख से सुख की ओर: पीड़ित मानसिकता के रूपांतरण हेतु नीडोनॉमिक्स का मार्गदर्शक दृष्टिकोण

प्रो.मदन मोहन गोयल, नीडोनॉमिक्स के प्रस्तावक और पूर्व कुलपति मानव संबंधों की सामाजिक जटिलताओं में भावनात्मक चोटें अक्सर अपरिहार्य होती हैं। जब कोई ठेस बाहरी कारणों—कठोर शब्द, विश्वासघात, असफलता या अन्याय—से लगती है, तब उसका दीर्घकालिक प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि हम उसे आंतरिक रूप से कैसे संसाधित करते हैं। एक बार का दर्द, जब भय और असहायता से भरे विचारों के माध्यम से बार-बार याद किया जाता है, तो वह गहरी जड़ें जमाकर एक पीड़ित मानसिकता में बदल जाता है। नीडोनॉमिक्स स्कूल ऑफ थॉट ( एनएसटी), जो नैतिक अर्थशास्त्र और जागरूक जीवनशैली में निहित है, इस पीड़ित मानसिकता को रूपांतरित करने को व्यक्तिगत कल्याण और सामाजिक समरसता के लिए आवश्यक मानता है। पीड़ित मानसिकता की समझ पीड़ित मानसिकता एक ऐसा मानसिक भाव है जिसमें व्यक्ति यह मानने लगता है कि उसके साथ लगातार अन्याय, दुख या शोषण हो रहा है। इसमें अक्सर शक्तिहीनता, आरोप, आक्रोश और भय की भावनाएं शामिल होती हैं। जब कोई व्यक्ति अपने दर्द को रचनात्मक रूप से संसाधित करने में असफल रहता है, तो उसका मन भय-आधारित कथाओं का घर बन जाता है, जो आत्म-दया, खुद को सही ठहराने और पीड़ा को चुपचाप स्वीकार करने के चक्र को जन्म देता है। एनएसटी के दृष्टिकोण से यह मानसिकता केवल भावनात्मक रूप से हानिकारक नहीं है, बल्कि आर्थिक रूप से भी अव्यवहारिक है। यह निर्णय लेने की क्षमता को बाधित करती है, रचनात्मकता को कम करती है, पहल को हतोत्साहित करती है और आश्रित मानसिकता को बढ़ावा देती है—जो व्यक्तिगत और सामूहिक प्रगति के लिए बाधक हैं। भय और चोट की भूमिका चोट लगना एक भावनात्मक प्रतिक्रिया है; लेकिन उस चोट में डूबे रहना एक मानसिक विकल्प है। जब दर्द के साथ भय जुड़ता है, तो यह मानसिकता को और भी विकृत कर देता है। विचार जैसे “मैं फिर से चोट खाऊँगा,” “मैं कमजोर हूँ,” या “वे मेरे खिलाफ हैं” मन को घेर लेते हैं। एनएसटी कहता है कि भय भी एक प्रकार की भावनात्मक अपव्यय है, जैसे वित्तीय अपव्यय में अनावश्यक खर्च। जैसे अर्थव्यवस्था में बजट बनाना ज़रूरी है, वैसे ही भावनाओं का बजट बनाना चाहिए—और डर जैसे अनावश्यक खर्चों से बचना चाहिए। नीडोनॉमिक्स दृष्टिकोण: विश्लेषण, समझ और व्याख्या नीडोनॉमिक्स केवल आर्थिक जरूरतों का नहीं, बल्कि भावनात्मक और मानसिक जरूरतों का भी विश्लेषण करना सिखाता है। पीड़ित मानसिकता से मुक्त होने के लिए यह तीन-चरणीय प्रक्रिया सुझाता है: 1. मूल कारण की समझ मुझे वास्तव में क्या चोट पहुँची? वह कार्य, उसकी मंशा या मेरी व्याख्या—क्या अधिक चोट पहुँचा रही है? क्या मैं उस पल को अपने मन में बार-बार जी रहा हूँ? एनएसटी कहता है कि अक्सर घटना से ज्यादा हमारी व्याख्या और मानसिक दोहराव पीड़ा को बनाए रखते हैं। 2. आरोप के बिना विश्लेषण...

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नीडोनॉमिक्स के दृष्टिकोण से अपराध और पाप: वैधानिकता से आगे नैतिक पुनर्वास की ओर

प्रो. मदन मोहन गोयल, पूर्व कुलपति एक ऐसे युग में जहाँ न्याय को अक्सर कोड, अदालतों और जेलों के माध्यम से मापा जाता है, वहाँ नीडोनॉमिक्स स्कूल ऑफ थॉट (एनएसटी) जिसे प्रो. एम.एम. गोयल नीडोनॉमिक्स फाउंडेशन (पंजीकृत ट्रस्ट) द्वारा प्रवर्तित किया गया है, हमें अपराध और पाप में अंतर करने की आवश्यकता की ओर संकेत करता है — अर्थात् जो कानूनी रूप से दंडनीय है और जो नैतिक दृष्टि से निंदनीय है। यह अंतर केवल शब्दों का खेल नहीं है, बल्कि एक मानवीय और न्यायपूर्ण समाज की नींव है। एनएसटी,  गीता की नैतिक दिशा और "नीडोएथिक्स" (आवश्यकताओं की नैतिकता) के मंत्र से प्रेरित होकर, कानून को नैतिकता, करुणा और आध्यात्मिक विवेक की दृष्टि से देखने का आग्रह करता है। 1 अपराध बनाम पाप: विभाजन रेखा न्याय के दर्शन में, अपराध एक ऐसा कृत्य है जो कानून का उल्लंघन करता है — जिसे राज्य द्वारा दंडित और न्यायालयों द्वारा निर्णयित किया जाता है। जबकि पाप ईश्वरीय या नैतिक सिद्धांतों का उल्लंघन होता है, जिसे अंतःकरण और आध्यात्मिक मानदंडों से आंका जाता है। एनएसटी मानता है कि हर अपराध पाप नहीं होता और हर पाप अपराध नहीं होता, लेकिन इन दोनों में जो समानता है, उसे अनदेखा नहीं किया जा सकता। कल्पना कीजिए कि एक गरीब व्यक्ति भूख से बिलखते बच्चों को रोटी खिलाने के लिए चोरी करता है। यह कानून की दृष्टि में अपराध है, और उसे जेल भेजा जाता है। लेकिन क्या यह पाप है? नीडोनॉमिक्स, जो मूलभूत मानवीय आवश्यकताओं की गरिमा और करुणा को दंड से ऊपर मानता है, इस कृत्य को पाप नहीं मानता। इसके विपरीत, यह उस प्रणालीगत उपेक्षा को पाप मानता है, जो भूखों को भोजन नहीं दे पाई, परंतु उन्हें सजा देना जानती है। वहीं दूसरी ओर, यदि कोई कॉरपोरेट अधिकारी झूठे दस्तावेज़ों से करोड़ों कमाता है और हजारों की नौकरियां छीन लेता है, तो यह कृत्य वर्षों तक अपराध के रूप में उजागर नहीं हो सकता, पर नैतिक दृष्टि से यह तत्काल पाप है — लालच, भरोसे के साथ विश्वासघात और मानवीय जीवन के प्रति उपेक्षा से उत्पन्न। 2 नैतिक कल्पना की आवश्यकता नीडोनॉमिक्स अराजकता या कानूनविहीनता का समर्थन नहीं करता। कानून आवश्यक हैं। लेकिन एनएसटी मानता है कि बिना नैतिक चेतना के कानून केवल अंध साधन बन जाते हैं, जो लक्षणों को सज़ा देते हैं, कारणों को नहीं।...

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खेलो भारत नीति 2025: नीडोनॉमिक्स दृष्टिकोण से विकसित भारत हेतु स्ट्रीट स्मार्ट खेल प्रशासन

प्रो. मदन मोहन गोयल, पूर्व कुलपति, तीन विश्वविद्यालय 1 जुलाई 2025 को घोषित ‘खेलो भारत नीति 2025’ भारत की खेल नीति में एक परिवर्तनकारी कदम है, जिसका उद्देश्य 2047 तक भारत को शीर्ष पाँच वैश्विक खेल राष्ट्रों में शामिल करना है। इस दूरदर्शी पहल का स्वागत करते हुए, नीडोनॉमिक्स स्कूल ऑफ थॉट (एनएसटी ) इसे केवल एक नीति नहीं, बल्कि राष्ट्रीय अनुशासन, समग्र विकास और सामाजिक परिवर्तन के लिए एक मार्गदर्शक दर्शन मानता है। चाहतों के पीछे भागने के बजाय आवश्यकताओं को पूरा करने पर बल देने वाली नीडोनॉमिक्स, खेल नीति को राष्ट्रीय मूल्यों और प्राथमिकताओं के अनुरूप दिशा देने वाली नैतिक और आर्थिक दृष्टि प्रदान करती है। खेलो भारत नीति 2025 के पाँच स्तंभ और एनएसटी की दृष्टि खेलो भारत नीति 2025 के पाँच स्तंभ—वैश्विक स्तर पर उत्कृष्टता, आर्थिक विकास के लिए खेल, जन आंदोलन के रूप में खेल, राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ( एनईपी) के साथ एकीकरण, और भारतीय खेल प्रतिभा का पोषण- एनएसटी के सिद्धांतों से गहराई से मेल खाते हैं। आइए इन्हें नीडोनॉमिक्स के दृष्टिकोण से समझते हैं: 1. वैश्विक मंच पर उत्कृष्टता: दुनिया के शीर्ष पाँच खेल राष्ट्रों में शामिल होने की महत्वाकांक्षा उल्लेखनीय और यथार्थवादी है। एनएसटी इसे तभी समर्थन देता है जब यह उत्कृष्टता पदकों और ग्लैमर के बजाय नैतिकता, समावेशिता और अनुशासन पर आधारित हो। इसके लिए 2036 ओलंपिक को ध्यान में रखते हुए विश्व स्तरीय कोचिंग तंत्र और मजबूत प्रशासनिक ढांचा आवश्यक है जो पारदर्शी, उत्तरदायी और भागीदारीपूर्ण हो। 2. आर्थिक विकास के लिए खेल: एनएसटी के अनुसार, खेल केवल मनोरंजन नहीं बल्कि उत्पादक आर्थिक क्षेत्र हैं। खेल अवसंरचना, खेल पर्यटन और आयोजन प्रबंधन में निवेश से रोज़गार, उद्यमिता और कौशल विकास को बढ़ावा मिल सकता है। लेकिन यह विकास आवश्यकता आधारित, न्यायसंगत और संतुलित होना चाहिए, न कि क्रिकेट जैसे बाज़ार-प्रेरित खेलों के पक्ष में झुका हुआ। 3. जन आंदोलन के रूप में खेल: नीडोनॉमिक्स का मानना है कि खेलों का लोकतंत्रीकरण होना चाहिए—गांव से शहर, गरीब से अमीर, पुरुष से महिला और सामान्य से विशेष जरूरतों वाले हर नागरिक की भागीदारी होनी चाहिए। जब खेल जन आंदोलन बनते हैं, तो वे सामाजिक एकता, राष्ट्रीय गौरव और नागरिक अनुशासन को बढ़ावा देते हैं। यह आंदोलन युवाओं को नशाखोरी जैसी सामाजिक बुराइयों से बचाने में भी सहायक होगा। 4. राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के साथ एकीकरण: राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 समग्र विकास और बहुविषयक शिक्षा पर बल देती है।  एनएसटी खेलों को शिक्षा प्रणाली में शरीर, मन और आत्मा की एकता के रूप में जोड़ने का स्वागत करता है। यह एकीकरण औपचारिक नहीं बल्कि ठोस होना चाहिए, जिसमें पाठ्यक्रम संशोधन, अवसंरचना विकास और कोच की भर्ती शामिल हो। 5. भारतीय खेल प्रतिभा का पोषण: प्रतिभा के पनपने के लिए केवल चयन और प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि प्रशिक्षण, रोजगार, मानसिक स्वास्थ्य और सेवानिवृत्ति के बाद की सुरक्षा आवश्यक है।  एनएसटी रोज़गार से जुड़ी योजनाओं, बीमा कवर और खेल को सम्मानित पेशा मानने की वकालत करता है। स्ट्रीट  स्मार्ट खेल प्रशासन की आवश्यकता एनएसटी स्ट्रीट  स्मार्ट प्रशासन की पैरवी करता है—Simple (सरल),...

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अपशिष्ट से उपयोगिता तक : भारत में प्लास्टिक रीसाइक्लिंग के लिए नीडोनॉमिक रोडमैप

प्रो. मदन मोहन गोयल, पूर्व कुलपति जलवायु संकट और पर्यावरणीय क्षरण के इस युग में, भारत एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है — जहाँ प्लास्टिक कचरे के प्रबंधन में टुकड़ों-टुकड़ों में किए जा रहे प्रयासों की जगह अब समग्र और साहसिक कदमों की आवश्यकता है। नीडोनॉमिक्स स्कूल ऑफ थॉट (एनएसटी  ) इस संकट का समाधान एक संरचित और समावेशी दृष्टिकोण के माध्यम से करना चाहता है।  एनएसटी का यह विश्वास है कि "अपशिष्ट तब तक अपशिष्ट नहीं होता जब तक हम उसे व्यर्थ नहीं कर देते।" यह दृष्टिकोण सोच में बदलाव की मांग करता है — अपशिष्ट से उपयोगिता की ओर, जिसके लिए परिपत्र अर्थव्यवस्था  के सिद्धांतों को अपनाना और पूरे प्लास्टिक पुनर्चक्रण मूल्य श्रृंखला का आधुनिकीकरण करना आवश्यक है। भारत में प्लास्टिक का विरोधाभास कभी चमत्कारी माने जाने वाले प्लास्टिक को आज एक वैश्विक पर्यावरणीय संकट का कारण माना जाता है। भारत हर वर्ष लगभग 3.5 मिलियन टन प्लास्टिक कचरा उत्पन्न करता है, जिसका एक बड़ा हिस्सा लैंडफिल्स, नदियों और समुद्रों में चला जाता है। यद्यपि कुछ हद तक पुनर्चक्रण होता है, फिर भी यह प्रक्रिया अव्यवस्थित, असंगठित और सीमित है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (  सीपीसीबी) ने प्लास्टिक कचरा प्रबंधन की निगरानी और विनियमन में महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं, लेकिन केवल नियमन पर्याप्त नहीं है। आवश्यकता है एक एकीकृत, नवोन्मेषी और प्रेरणादायक दृष्टिकोण की — जो कि "जरूरत आधारित जीवन" को प्राथमिकता देने वाले नीडोनॉमिक्स सिद्धांतों पर आधारित हो। परिवर्तन का मांडेट: नीडोनॉमिक्स दृष्टिकोण एनएसटी प्लास्टिक पुनर्चक्रण पारिस्थितिकी तंत्र में निम्नलिखित प्रमुख सुधारों की मांग करता है: 1. पारदर्शिता और दक्षता के लिए तकनीक का समावेश प्रौद्योगिकी इस परिवर्तन की धुरी होनी चाहिए। रीयल-टाइम डिजिटल ट्रैकिंग, एआई आधारित छंटाई, और स्मार्ट डस्टबिन व ट्रकों में IoT सेंसर के माध्यम से कचरा संग्रहण से पुनर्चक्रण तक की प्रक्रिया को कुशल बनाया जा सकता है। मोबाइल ऐप्स के माध्यम से नागरिकों, नगर निकायों, कबाड़ीवालों और पुनर्चक्रणकर्ताओं को जोड़कर एक जवाबदेह प्रणाली बनाई जा सकती है।  एनएसटी का मानना है कि यह तकनीकी बदलाव केवल शहरी क्षेत्रों तक सीमित न हो — इसके लिए ग्रामीण और अर्ध-शहरी भारत हेतु सस्ते और स्केलेबल मॉडल विकसित किए जाएं। 2. असंगठित क्षेत्र की भूमिका का पुनर्परिकल्पन भारत में 15 लाख से अधिक लोग अनौपचारिक कचरा बीनने के कार्य से जुड़े हैं। ये लोग पुनर्चक्रण की रीढ़ हैं, लेकिन उपेक्षित भी हैं।  एनएसटी का मॉडल इन्हें सहकारी समितियों, पहचान पत्र, प्रशिक्षण, और सुरक्षा उपकरण के माध्यम से औपचारिक प्रणाली में शामिल करने का पक्षधर है। इनकी गरिमा का सम्मान करते हुए इनकी जमीनी समझ का लाभ लिया जा सकता है। 3. विकेंद्रीकृत स्मार्ट अवसंरचना एनएसटी का सुझाव है कि बड़े केंद्रीकृत पुनर्चक्रण संयंत्रों की जगह स्थानीय पुनर्चक्रण केंद्र बनाए जाएं — छोटे, मोबाइल, और स्रोत के निकट। इससे परिवहन लागत घटेगी, कार्बन उत्सर्जन कम होगा, और सामुदायिक भागीदारी को प्रोत्साहन मिलेगा। हर नगरपालिका वार्ड, पंचायत, या शहरी झुग्गी क्षेत्र में ऐसे केंद्र स्थापित किए जा सकते हैं, जो सार्वजनिक-निजी भागीदारी द्वारा संचालित हों। 4. जनमानस में बदलाव: “यूज़ एंड थ्रो” से “रीयूज़ एंड रिस्पेक्ट” समस्या का मूल व्यवहार में है।  एनएसटी मानता है कि पर्यावरणीय नैतिकता को स्कूलों, कॉलेजों और सामुदायिक केंद्रों में प्रतिदिन की बातचीत का हिस्सा बनाया जाए। जन-जागरूकता अभियानों जैसे “प्लास्टिक को पहचानो, पुनः उपयोग में लाओ” से उत्तरदायी उपभोग को बढ़ावा दिया जा सकता है। बिहेवियरल इकॉनॉमिक्स के औजारों जैसे पुरस्कार प्रणाली भी प्रभावी सिद्ध हो सकती है। परिपत्र अर्थव्यवस्था: चक्र को पूर्ण करना...

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हमें अपनी सामूहिक प्रतिबद्धता के गुणक प्रभाव के लिए गीता-आधारित नीडोनोमिक्स को अपनाना चाहिए- प्रो. मदन मोहन गोयल

समग्र समाचार सेवा कुरूक्षेत्र, 18दिसंबर। “दिल्ली में जी20 शिखर सम्मेलन में बताए गए वसुधैव कुटुंबकम में आश्वस्त परिवार...