अनुत्पादक परिसंपत्तियों का रणनीतिक रूपांतरण: विकसित भारत के लिए एक नीडोनॉमिक्स मॉडल
प्रो. मदन मोहन गोयल, प्रणेता—नीडोनॉमिक्स स्कूल ऑफ थॉट एवं पूर्व कुलपति (तीन बार) जब भारत विकसित भारत 2047 के महत्वाकांक्षी लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है, तब राष्ट्र अपार अवसरों और गंभीर चुनौतियों के बीच खड़ा है। एक पूर्ण विकसित, समावेशी और सतत भारत का निर्माण पारंपरिक आर्थिक ढाँचे से आगे बढ़कर नवोन्मेषी सोच की मांग करता है। नीडोनॉमिक्स स्कूल ऑफ थॉट (एनएसटी ) जो लोभ के स्थान पर आवश्यकता को प्राथमिकता देता है—राष्ट्रीय विकास की पुनर्कल्पना के लिए एक परिवर्तनकारी दृष्टिकोण प्रदान करता है। इसके अनेक प्रस्थापनों में से एक, सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों में मौजूद अनुपयोगी परिसंपत्तियों को उत्पादक रूप में बदलने का विचार—बेरोजगारी, अपर्याप्त बुनियादी ढाँचा और संसाधनों की अक्षमता जैसे प्रणालीगत समस्याओं को हल करने की अपार क्षमता रखता है। आज भारत के पास अनुपयोगी, परित्यक्त या गलत तरीके से प्रबंधित परिसंपत्तियों का विशाल भंडार है—अप्रयुक्त सरकारी भवन, अनुपयोगी भूमि, अनुपयोगी मशीनरी, खाली सरकारी सुविधाएँ, बंद सार्वजनिक उपक्रम, खाली आवासीय इकाइयाँ तथा कानूनी विवादों में उलझी निजी संपत्तियाँ। ये सभी अनुपयोगी परिसंपत्तियाँ जमे हुए पूँजी समान हैं—जो न तो आय उत्पन्न करती हैं और न ही जनकल्याण में योगदान देती हैं। नीडोनॉमिक्स का आह्वान है कि इन निष्क्रिय संसाधनों को अनलॉक करना केवल परिसंपत्ति प्रबंधन नहीं, बल्कि राष्ट्रीय विकास, पीढ़ीगत न्याय और मानवीय कल्याण से जुड़ी एक नैतिक जिम्मेदारी है। नीडोनॉमिक्स दृष्टिकोण: अनुपयोगी परिसंपत्तियों का महत्व क्यों नीडोनॉमिक्स संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग और वास्तविक आवश्यकताओं की पूर्ति पर आधारित है। इस दृष्टिकोण में एक अनुपयोगी परिसंपत्ति केवल आर्थिक बोझ नहीं, बल्कि शासन और सामाजिक प्रबंधन की नैतिक विफलता है। बहुमूल्य भूमि, भवन और बुनियादी ढाँचा खाली पड़े रहने देना संसाधनों के जिम्मेदार उपयोग की भावना के विरुद्ध है। यह कृत्रिम कमी भी पैदा करता है—भूमि, सुविधाओं और अवसरों की कमी, जिससे युवा विकास और सामाजिक कल्याण बाधित होता है। नीडोनॉमिक्स के अनुसार परिसंपत्तियों का उत्पादक उपयोग केवल आर्थिक आवश्यकता नहीं, बल्कि नैतिक दायित्व है। यह नष्ट करने की नहीं, बल्कि रूपांतरण की बात करता है—ऐसे उपयोग की जो सामाजिक मूल्य, रोजगार, और नवाचार को अधिकतम करे। सार्वजनिक क्षेत्र की परिसंपत्तियाँ: एक सोया हुआ दिग्गज भारत में सार्वजनिक संस्थानों के पास अनुपयोगी परिसंपत्तियों का विशाल भंडार है, जैसे— रेलवे, रक्षा, सार्वजनिक उपक्रमों और नगरीय निकायों की अप्रयुक्त जमीन जर्जर या कम उपयोग में आने वाली सरकारी इमारतें मूल्यवान भूमि के साथ बैठे निष्क्रिय राज्य-स्वामित्व वाले उपक्रम पुराने शैक्षिक और स्वास्थ्य संस्थान खाली पड़े गोदाम, फैक्टरियाँ और औद्योगिक क्षेत्र इनके निष्क्रिय रहने से राष्ट्र को राजस्व, रोजगार, उद्यमिता, और बेहतर सेवा वितरण—चारों में हानि होती है। नीडोनॉमिक्स इनके लिए तीन-स्तरीय रणनीति प्रस्तुत करता है— 1. सामाजिक अवसंरचना हेतु पुनर्पयोग अनुपयोगी इमारतें बदली जा सकती हैं— कौशल विकास केंद्रों में MSME इनक्यूबेशन हब में सार्वजनिक पुस्तकालयों में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में युवाओं और महिलाओं के प्रशिक्षण अकादमियों में यह अवसर बढ़ाता है और आवश्यक सेवाओं तक पहुँच सुधारता है। 2. जिम्मेदार मुद्रीकरण भविष्य में आवश्यक न होने वाली भूमि/भवन को पट्टे पर दिया जा सकता है— हरित उद्योग लॉजिस्टिक हब किफायती आवास कृषि मूल्य श्रृंखला इकाइयाँ नियमित किराये से सरकारी वित्त मजबूत होगा जबकि स्वामित्व भी बना रहेगा।...
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