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एनएचआरसी ने विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस पर मानसिक बीमारियों से पीड़ित व्यक्तियों के कल्याण और अधिकारों को सुनिश्चित करने के लिए जारी किया परामर्श

समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली, 11अक्टूबर। आज विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस पर, राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग, एनएचआरसी, भारत ने मानसिक बीमारियों से पीड़ित व्यक्तियों के कल्याण और अधिकारों को सुनिश्चित करने के लिए केंद्र, राज्यों और संघ राज्‍य क्षेत्र प्रशासनों को परामर्शी जारी की है। आयोग ने कहा है कि मानसिक स्वास्थ्य किसी भी व्यक्ति के सार्थक और उत्पादक जीवन का आधार है। हालाँकि, मानसिक बीमारियों से पीड़ित व्यक्तियों को मानसिक स्वास्थ्य सेवाएँ प्रदान करने और उनके अधिकारों के संरक्षण के लिए मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017 के अधिनियमन के बावजूद जमीन स्‍तर पर इसका कार्यान्वयन चिंता का विषय बना हुआ है।

परामर्शी में मानसिक बीमारियों से पीड़ित व्यक्तियों के कल्याण और अधिकारों को सुनिश्चित करने के लिए केंद्र, राज्यों और संघ राज्‍य क्षेत्र प्रशासन द्वारा कार्रवाई के लिए सात प्रमुख क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित किया गया है। इनमें मौजूदा कानूनों और नीतियों का कार्यान्वयन, बुनियादी ढांचे और सुविधाएं, मानव संसाधन, आउटरीच और सामुदायिक सेवाएं, ठीक हो चुके मरीजों का पुनर्वास, राज्यों की सेवाएं और जन जागरूकता और संवेदीकरण शामिल हैं।

आयोग द्वारा केंद्रीय स्वास्थ्य और कल्याण मंत्रालय के सचिव, राज्यों के मुख्य सचिवों और केंद्र शासित प्रदेशों के प्रशासकों को लिखे गए पत्र में अपनी सिफारिशों को अक्षरश: लागू करने और दो महीने के भीतर की गई कार्रवाई रिपोर्ट मांगी गई है।

साथ ही, कुछ महत्वपूर्ण सिफ़ारिशें इस प्रकार हैं;

• मानसिक स्वास्थ्य देखभाल को सुगम और किफायती बनाने के लिए बीमा पॉलिसियों और योजनाओं में मानसिक बीमारियों का उपचार शामिल होना चाहिए;

• आर्थिक रूप से वंचित आबादी के लिए मानसिक विकारों के उपचार की पहुंच को बढ़ावा देने के लिए, मानसिक बीमारी को “आयुष्मान भारत” योजना में शामिल करना आवश्यक है;

• रोगियों और उनके परिवार के सदस्यों को उनके बैंक खाते खोलने के लिए उचित सहायता प्रदान की जानी चाहिए और उन्हें विभिन्न लाभों और सामाजिक योजनाओं के बारे में जागरूक किया जाना चाहिए और सुविधा प्रदान की जानी चाहिए;

• मरीजों को आधार कार्ड प्रदान करने और उनके विवरण को अनिवार्य रूप से अद्यतन करने के लिए संस्‍थानों में शिविर आयोजित और स्थापित किए जा सकते हैं;

• ‘मानसिक स्वास्थ्य’ को भी एक विषय वस्तु के रूप में शामिल किया जा सकता है जिसके लिए कंपनी अधिनियम, 2013 की अनुसूची VII (i) के तहत कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व निधि दी जा सकती है;

• प्रत्येक संस्‍थान में मुफ्त कानूनी सहायता सुनिश्चित करने के लिए एक व्यक्ति को निर्दिष्ट किया जाना चाहिए, जैसा कि अधिनियम, 2017 की धारा 27 के तहत अनिवार्य है;

• संस्‍थानों में सामान्य सुविधाओं को बनाए रखा जाए और बढ़ाया जाए, जिसमें बिस्तरों की संख्या, पानी, स्वच्छता, भोजन, बिस्तर, कपड़े, मनोरंजक गतिविधियों का प्रावधान आदि शामिल हैं;

• सभी संस्‍थानों में बच्चों और किशोरों के लिए एक अलग वार्ड के अलावा मानसिक बीमारी से ग्रस्त वृद्धजनों के लिए विशेष देखभाल की सुविधाएं दी जाएंगी और रोगियों को उनके परिवारों के करीब बेहतर मानसिक स्वास्थ्य देखभाल प्रदान करने के लिए पारिवारिक वार्डों की संख्या में वृद्धि की जाएगी;

• अधिनियम 2017 की धारा 19 (3) के अनुसार अनिवार्य रूप से हाफवे होम सिस्टम प्रदान करना, पुनर्वास प्रयासों को कई विभागों के साथ समन्वित किया जाना चाहिए;

• डिस्चार्ज होने के लिए फिट घोषित होने के बाद मरीजों को एक दिन के लिए भी संस्‍थानों में नहीं रखा जाना चाहिए;

• किसी अस्पताल, संस्थान, आश्रय गृह, साझा आवास, पुनर्वास गृह, हाफवे हाउस, दया गृह आदि के परिसर में होने वाली सभी मौतों की सूचना 24 घंटे के भीतर स्थानीय पुलिस को और मृत्यु के 48 घंटे के भीतर एनएचआरसी को दी जानी चाहिए;

• धारा 31 (3) के तहत 10 वर्षों के लक्ष्य को प्राप्त करने की सुविधा के लिए सभी मानसिक स्वास्थ्य पेशेवरों को पंजीकृत करने के लिए एक सामान्य वेब पोर्टल सार्वजनिक डोमेन में प्रदान किया जाना चाहिए;

• सभी राज्यों/संघ राज्‍य क्षेत्रों को मानसिक स्वास्थ्य प्राधिकरण, मानसिक स्वास्थ्य समीक्षा बोर्डों का गठन करने और मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017 (अधिनियम, 2017) की धारा 45, 73, 121 और 123 के तहत अनिवार्य नियमों और विनियमों को तैयार करने को प्राथमिकता देनी चाहिए;

• प्रत्येक जिले के लिए जिला मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम (डीएमएचपी) नामक एक ढांचागत कार्यक्रम तैयार किया जा सकता है, जिसमें सामुदायिक कार्यकर्ता शामिल होंगे;

• जैसा कि राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम (एनएमएचपी) में परिकल्पना की गई है, राज्य सरकारें समाज में मानसिक बीमारी के बारे में सामाजिक कलंक, भेदभाव और जागरूकता की कमी से निपटने के लिए मानसिक स्वास्थ्य क्षेत्र में सार्वजनिक-निजी भागीदारी और जन-जागरूकता सृजन गतिविधियों पर जोर दे सकती हैं;

• डीपीएम, एमडी, डीएनबी, एमफिल, मनोचिकित्सा में पीएचडी, मनोविज्ञान, पीएसडब्ल्यू और डीपीएन एवं अन्‍य डिप्‍लोमा, डिग्री, फेलोशिप आदि सहित आवश्यकताओं के अनुपात में अधिक पीजी सीटें बनाई जाएंगी। जैसा कि अधिनियम, 2017 की धारा 31(3) के तहत अनिवार्य है, 2027 तक जनसंख्या के आधार पर कई मानसिक स्वास्थ्य पेशेवरों के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत दिशानिर्देशों को पूरा करने के प्रयास किए जाने चाहिए;

• एक अलग विषय के रूप में, मनोचिकित्सा को स्नातक चिकित्सा पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए। बुनियादी मनोचिकित्सा में डॉक्टरों को प्रशिक्षित करने के लिए हर अवसर का उपयोग किया जाना चाहिए;

• गैर-मनोरोग डॉक्टरों, आशा (ASHA) कार्यकर्ताओं, सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारियों, स्वास्थ्य और कल्याण केंद्रों पर सेवा प्रदाताओं और अन्य फ्रंटलाइन कार्यकर्ताओं को बुनियादी निदान में प्रशिक्षित करने के लिए प्रशिक्षण मॉड्यूल विकसित किए जाएं और उन्हें मानसिक स्वास्थ्य प्राथमिक चिकित्सा कौशल हासिल करने के लिए प्रशिक्षित किया जाए;

• सभी संस्‍थानों में डॉक्टरों और अन्य कर्मचारियों सहित रिक्त पदों को तुरंत भरा जाना चाहिए;

• सरकार द्वारा स्कूल/कॉलेज स्तर पर और एनएमपीएच/डीएमपीएच स्तर पर भी योग्य कर्मचारियों के साथ परामर्शदाताओं के पद शीघ्र भरे जाने चाहिए;

• मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित मुद्दों के बारे में सार्वजनिक जागरूकता बढ़ाने के लिए सभी स्थानीय भाषाओं में अभियानों, टेलीविजन, समाचार पत्रों और अन्य मीडिया के माध्यम से बड़े पैमाने पर जागरूकता और संवेदीकरण किया जाना चाहिए;

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