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CJI बी. आर. गवई का बड़ा बयान: “सरकार ने दो बार सबसे वरिष्ठ जजों को नजरअंदाज किया”

समग्र समाचार सेवा,

नई दिल्ली, 4 जून: भारत के मुख्य न्यायाधीश बी. आर. गवई ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता और जजों की नियुक्ति पर एक अहम टिप्पणी की है। ब्रिटेन के सुप्रीम कोर्ट द्वारा आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय गोलमेज सम्मेलन में उन्होंने खुलासा किया कि भारत में सरकार ने दो बार सबसे वरिष्ठ न्यायाधीशों को नजरअंदाज करते हुए देश के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति की थी। उन्होंने इस प्रक्रिया को ‘न्यायिक स्वतंत्रता के लिए चिंताजनक’ करार दिया और कॉलेजियम प्रणाली की मजबूती की वकालत की।

सरकार का अंतिम निर्णय, परंपरा का उल्लंघन

गोलमेज सम्मेलन में ब्रिटेन के जज जॉर्ज लेगट और इंग्लैंड-वेल्स की लेडी चीफ जस्टिस बैरोनेस कैर भी उपस्थित थीं। इस दौरान सीजेआई गवई ने कहा, “1993 से पहले तक भारत में सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में जजों की नियुक्ति का अंतिम निर्णय कार्यपालिका के पास होता था। इस दौरान सरकार ने दो बार वरिष्ठता की स्थापित परंपरा को तोड़ा।”

उन्होंने साफ किया कि यह हस्तक्षेप न केवल न्यायिक परंपराओं का उल्लंघन था, बल्कि इससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता को भी ठेस पहुंची।

जस्टिस जाफर इमाम और हंसराज खन्ना का जिक्र

अपने संबोधन में उन्होंने दो ऐतिहासिक उदाहरणों का उल्लेख किया। पहला, 1964 में जब जस्टिस सैयद जाफर इमाम को उनके स्वास्थ्य कारणों का हवाला देकर मुख्य न्यायाधीश नहीं बनाया गया और जस्टिस पी. बी. गजेंद्रगढ़कर को नियुक्त किया गया। दूसरा, 1977 में जब जस्टिस हंसराज खन्ना—जिन्होंने आपातकाल के दौरान नागरिक अधिकारों के पक्ष में ऐतिहासिक फैसला दिया था—को इंदिरा गांधी सरकार ने नजरअंदाज कर दिया।

NJAC को खारिज करना सही कदम: CJI

सीजेआई गवई ने 2015 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा नेशनल ज्यूडिशियल अपॉइंटमेंट्स कमीशन (NJAC) को असंवैधानिक ठहराए जाने को एक ऐतिहासिक फैसला बताया। उन्होंने कहा, “इस कानून से कार्यपालिका को नियुक्तियों में प्राथमिकता दी जा रही थी, जिससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता को गंभीर खतरा था। कॉलेजियम प्रणाली में सुधार की जरूरत हो सकती है, लेकिन कोई भी तरीका न्यायिक स्वतंत्रता की कीमत पर नहीं होना चाहिए।”

रिटायरमेंट के बाद सरकारी पदों पर चिंता

CJI गवई ने यह भी कहा कि जजों द्वारा रिटायरमेंट के तुरंत बाद किसी सरकारी पद को स्वीकार करना, या इस्तीफा देकर चुनाव लड़ना, जनता के मन में न्यायपालिका की निष्पक्षता पर संदेह पैदा करता है। उन्होंने कहा, “ऐसे मामलों में नैतिक सवाल उठते हैं। लोग मानने लगते हैं कि न्यायिक फैसले शायद भविष्य के लाभ की आशा में दिए गए हों। इससे न्यायपालिका की सार्वजनिक विश्वसनीयता को नुकसान होता है।”

न्यायपालिका में भरोसा बनाना आवश्यक

अपने समापन वक्तव्य में CJI गवई ने कहा कि न्यायपालिका को न केवल निष्पक्ष होना चाहिए, बल्कि जनता को भी इसका विश्वास होना चाहिए कि यह निष्पक्ष है। जजों की नियुक्ति, उनके आचरण और फैसलों में पारदर्शिता और जवाबदेही आवश्यक है, जिससे लोकतंत्र की नींव मजबूत बनी रहे।

 

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