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लोकसभा में SIR बहस पर हंगामा, अध्यक्ष बिरला ने विपक्ष को दी नसीहत

समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली, 01 अगस्त: लोकसभा में शुक्रवार को बिहार की मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर विपक्षी सांसदों द्वारा विरोध-प्रदर्शन होते ही माहौल गर्म हो गया। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने उन्हें न केवल शांत रहने की नसीहत दी, बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया बनाए रखने का सशक्त संदेश भी दिया।

संसद की मानसून सत्र की शुरुआत 21 जुलाई से हो चुकी है और यह बैठक अब दसवें दिन में प्रवेश कर चुकी है। इस दौरान केवल मंगलवार और बुधवार को ही प्रश्नकाल निर्बाध रूप से हो सका, जबकि अन्य दिनों में प्रदर्शन और स्थगन का सिलसिला जारी रहा।

विपक्ष का प्रदर्शन और सदन का स्थगन

जैसे ही कार्यवाही शुरू हुई, विपक्षी सदस्य SIR मुद्दे पर चर्चा की मांग करने लगे। नारेबाजी और तख्तियों के कारण सदन की कार्यवाही कुछ ही मिनटों में दोपहर दो बजे तक स्थगित कर दी गई। इस वजह से प्रश्नकाल भी नहीं चल पाया।

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने से कुछ सांसदों से कहा:
“सदन की गरिमा बनाए रखें। प्रश्नकाल बहुत महत्वपूर्ण है। आप नारेबाजी और तख्तियों से अन्य सदस्यों का अधिकार नहीं छीन सकते।”
उन्होंने आगे जोड़ा: “आप नारेबाजी करके जनता की अभिव्यक्ति नहीं कर रहे हैं। जनता ने आपको जो अवसर दिया है, उसे नारेबाजी से मत गंवाइए।”

लोकतंत्र की रक्षा—बिरला का आह्वान

बिरला ने उपस्थित वरिष्ठ नेताओं की ओर इशारा करते हुए कहा कि इस प्रकार का व्यवहार उचित नहीं है। उन्होंने लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए सदस्यों को अनुशासित तरीके से प्रश्न उठाने की अनुमति देने का महत्त्व बताया। उनका कहना था:
“मैं रोज आपसे आग्रह करता हूँ कि सदन की कार्यवाही को चलने दें। सांसदों को प्रश्न उठाने दें और देश को आगे बढ़ाने में सहयोग करें।”

प्रमुख विषय और स्थगन का असर

इस सत्र में ऑपरेशन सिंदूर पर विशेष चर्चा तथा मणिपुर में राष्ट्रपति शासन बढ़ाने संबंधी सांवैधानिक प्रस्ताव पारित हो चुका है। लेकिन SIR जैसे संवेदनशील विषय पर विधायी या विवरणात्मक कार्य न चल पाने से सदन की उपादेयता प्रभावित हुई है।

लोकसभा में विपक्ष के हंगामे और सदन की स्थगन की स्थिति से स्पष्ट है कि SIR मुद्दा विधायी प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा होने के साथ-साथ राष्ट्रीय ध्यान का केंद्र भी बन गया है। ओम बिरला की बात—कि नारेबाजी जनता की आवाज़ नहीं, बल्कि लोकतंत्र के अधिकार का हनन है—यह हमें याद दिलाती है कि संसद में हिंसा नहीं, संवाद, जिम्मेदारी और जवाबदेही का मौलिक होना चाहिए।

 

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